हिंदसा

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

नाटक

                                                                    नाटक का विकास

नाटक गद्य साहित्य की एक अत्यंत व्यापक विधा है। नाटक लिखने की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा में नाट्य साहित्य की बहुत समृद्ध परंपरा मिलती है लेकिन हिंदी भाषा में नाटक का आरंभ 19 में शताब्दी में भारतेंदु युग से ही हुआ है। भारत में लोक परंपरा के रूप में भी नाटक विधा भारतीय लोक साहित्य में हमें मिलती है। हर प्रदेश का अपना लोक रंगमंच है। रासलीला, नौटंकी, स्वांग, रामलीला ,जात्रा यह सब लोक नाट्य परंपरा के ही रूप हैं। किंतु हिंदी नाटक के विकास की जहां तक बात है वह आधुनिक युग से ही आरंभ होता है इससे पहले जो हमें नाटक मिलते हैं वह गद्य में न मिलकर पद्य में मिलते हैं। वास्तव में हिंदी नाटक के आरंभ का श्रेय भी भारतेंदु को ही जाता है जैसे कि गद्य की दूसरी विधाएं निबंध और कहानी आदि का विकास भारतेंदु युग में होता है उसी तरह से नाटक का विकास भी भारतेंदु हरिश्चंद्र के द्वारा आधुनिक काल में ही किया गया।

हिंदी का सबसे पहला मौलिक नाटक नहुष को माना जाता है जो 1857 में भारतेंदु के पिता गोपाल चंद्र गिरधर दास के द्वारा लिखा गया था। हालांकि कुछ विद्वान विश्वनाथ सिंह के आनंद रघुनंदन नाटक को भी हिंदी का पहला मौलिक नाटक मानते हैं जो 1780 के आसपास लिखा गया था। किंतु उसमें एक तो ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। दूसरा वह रामलीला की पद्धति पर ही लिखा गया है। इसलिए वह उतना आधुनिक नाटक कला के निकट नहीं है जितना कि नहुष नाटक। इस समय संस्कृत के अभिज्ञान शाकुंतलम् का हिंदी अनुवाद जो राजा लक्ष्मण सिंह ने किया जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। जहां तक नाटक के विकास की बात है तो अध्ययन की सुविधा के लिए उसे भी हम तीन युगों में विभाजित कर लेते हैं-

भारतेंदु युग
प्रसाद युग
प्रसादोत्तर युग
भारतेंदु युग - भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक युग में मौलिक और अनुदित नाटको की रचना कर नाटको की प्राचीन परंपरा को आगे बढाया| भारतेंदु ने स्वं म भी नाटक लिखे और दूसरे साहित्यकारों को भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया । भारतेंदु युगीन नाटकों का मूल उद्देश्य पाश्चात्य संस्कृति के समक्ष भारतीय संस्कृति का महत्व प्रतिपादित करना, भारतीयों में राष्ट्रीय भावना को जागृत करना तथा सामाजिक बुराइयों से भारतीयों को अवगत करा कर उन बुराइयों को दूर करना रहा है। भारतेंदु ने युगीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसे नाटकों की रचना की। इस युग के नाटककार देश की सामाजिक और धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक दुर्दशा से भी आहत थे। उन्होंने देखा कि समाज को जगाने में नाटक सबसे ज्यादा प्रबल विधा है तो इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस युग के नाटककारों ने नाटक लिखें। इसलिए उन्होंने नाट्य साहित्य के माध्यम से समाज को जागृत करने का संकल्प लिया| इस युग के नाटककारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, श्रीनिवास दास, राधाचरण गोस्वामी, अंबिकादत्त व्यास प्रमुख है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो नाटकों की रचना के साथ साथ अभिनय भी किया और निर्देशन भी किया। उन्होंने मौलिक और अनुदित दोनों प्रकार के नाटकों का सृजन किया। अनुदित नाटक मूलतः बंगला, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं के हैं और अनूदित और मौलिक कुल मिलाकर 22 नाटकों की रचना की। जिनमें से प्रमुख है- चंद्रावली, नील देवी, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, विद्या सुंदर, मुद्राराक्षस, सत्य हरिशचंद्र, रत्नावली आदि।
भारतेंदु के समकालीन नाटककारों में बालकृष्ण भट्ट का नाम भी प्रमुख है उन्होंने 15 नाटकों की रचना की। रेनू संहार, जैसा काम वैसा परिणाम, दमयंती स्वयंवर उनके मौलिक नाटक है। भट्ट जी ने देश काल संबंधी सामाजिक यथार्थ स्थिति का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है| उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य करके नैतिकता और मर्यादा को प्रतिष्ठित करना चाहा है| इसी कड़ी में लाला श्रीनिवास दास का नाम आता है जिन्होंने तप्ता संवरण, प्रहलाद चरित्र, रणधीर प्रेम मोहिनी, संयोगिता स्वयंवर नाम के चार नाटक लिखे| रणधीर प्रेम मोहिनी उनकी श्रेष्ठ रचना है जिसको हिंदी का प्रथम दुखांत नाटक भी माना जाता है| इन्होंने अपनी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य नृत्य शैलियों का समन्वय किया है| राधा कृष्ण दास भी भारतेंदु युग के प्रमुख नाटककार माने जाते हैं| इन्होंने दुखिनी बाला, महारानी पद्मावती, महाराणा प्रताप सिंह आदि नाटक लिखें| इनके नाटकों में क्रमिक विकास दिखाई देता है| प्रताप नारायण मिश्र ने भी सामाजिक विषयों पर- दूध का दूध पानी का पानी, हम्मीर हठ आदि नाटकों की रचना की है| कहने का तात्पर्य यह है कि संक्रांति किस काल में उत्पन्न युग के समस्याओं जैसे पारस्परिक फूट, धार्मिक अंधविश्वास, पाखंड छुआछूत, आर्थिक शोषण, बाल विवाह, विधवा विवाह, वेश्या गमन, मधपान, समाज सुधार, राष्ट्रीय गौरव आदि का चित्रण इस युग के नाटककार ने बखूबी किया है| इन नाटकों का मूल उद्देश्य समाज की कुरीतियों का समापन करना था |
प्रसाद युग- नाटक के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का नाम बड़े गौरव के साथ लिया जाता है। जयशंकर प्रसाद के आगमन से नाटक के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। प्रसाद ने ऐसे चरित्रों को निर्मित किया जो ऐतिहासिक होते हुए भी समस्याओं की दृष्टि से प्रासंगिक थे| इन के नाटकों में भारतीय और पाश्चात्य तत्वों का समुचित समाहार दिखाई देता है| भारत के अतीत के प्रति गौरवमयी अनुभूति, प्रेम की भावुक तथा मानवीय संवेदना, अतीत की राष्ट्रीय गरिमा का आधुनिक संदर्भों में चित्रण आदि प्रसाद युग के नाटकों के प्रमुख विचारक तत्व हैं| जयशंकर प्रसाद के प्रमुख नाटकों में सज्जन, विशाल, अजातशत्रु, राज्यश्री, कामना, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि शामिल हैं|उन्होंने मुख्य रूप से ऐतिहासिक नाटक लिखें, कामना उनका प्रतीक नाटक है, प्रसाद के नाटकों में उनके अंतिम नाटक ध्रुवस्वामिनी का भी विशेष स्थान है, यह एक ऐतिहासिक और समस्या प्रधान नाटक है| इस नाटक में प्रसाद ने नारी समस्या को प्रस्तुत किया है| पुनर्विवाह का अधिकार हिंदू स्त्री को है और इस समस्या को उन्होंने इस नाटक में बड़ी ही कौशल से रखा है| शिल्प की दृष्टि से प्रसाद जी के नाटक बेजोड़ हैं, उनमें भारतीय और पाश्चात्य नाट्यकला का संतुलित समन्वय हुआ है| पाश्चात्य नाटकों में पाया जाने वाला संघर्ष, अंतर्द्वंद, व्आयक्दिति वैचित्र्य का प्रसाद के नाटकों में समावेश हुआ है| प्रसाद जी के नाटक न तो सुखांत है ना दुखांत| बल्कि वे प्रसादांत है| उनके नाटक श्रेष्ठ नाटकों की कोटी में श्रेणी में रखे जाते हैं| प्रसाद जी के नाटकों पर आरोप लगाया जाता है कि ये पाठ्य अधिक है, अभिनेय कम| दृश्यों की अधिकता, पात्रों की अधिकता, कलिष्ट भाषा, दार्शनिकता , बड़ा आकार उनके नाटकों में के दोष बताए जाते हैं| इसके बावजूद कहा जा सकता है कि प्रसाद महान नाटककार हैं प्रसाद युग के अन्य नाटक कारों में हरि कृष्ण प्रेमी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, सेठ गोविंद दास, गोविंद बल्लभ पंत उपेंद्रनाथ अश्क, वृंदावनलाल वर्मा, पांडे बेचन शर्मा उग्र आदि के नाम लिए जा सकते हैं | हरि कृष्ण प्रेमी का स्थान भी इस युग में महत्वपूर्ण है| उन्होंने भी ऐतिहासिक नाटकों की रचना की है| रक्षाबंधन उनका प्रसिद्ध नाटक है| इसी तरह से सेठ गोविंद दास ने भी अपने नाटकों में समकालीन सामाजिक समस्याओं जैसे छुआछूत, भ्रष्टाचार, पाखंड, नेताओं की स्वार्थपरता आदि का निरूपण करते हुए संतोष कहां ,त्याग और ग्रहण आधी नाटकों की रचना की है| उनके नाटक रंगमंच के अनुकूल हैं |
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि प्रसाद युग नाटक के विकास में एक क्रांतिकारी पड़ाव था, यह युग एक नवीन चेतना से युक्त था जिसमें राष्ट्रीयता की भावना की मुखर अभिव्यक्ति दिखाई देती है| भारत की सांस्कृतिक चेतना और प्राचीन गौरव को जयशंकर प्रसाद के साथ-साथ इस युग के दूसरे नाटककार ने भी अपने नाटकों में चित्रित किया है| हां इस युग के नाटक रंगमंच की दृष्टि से थोड़े कमजोर दिखाई पड़ते हैं।
प्रसादोत्तर युगीन
यह नाटक के विकास का एक नया युग माना जा सकता है| इस युग नाटकों में उन सभी प्रयोगों का विकसित रूप हम देख सकते हैं जो जयशंकर प्रसाद ने शुरू किए थे | साथ ही नाटकों में जीवन के नए यथार्थ बोध के कारण नवीन दृष्टि विकसित हुई| शिल्प की दृष्टि से भी अनेक रूप में उभरकर आए| इस युग के नाटककारों ने पौराणिक विषयों की तुलना में समसामयिक समस्या मूलक विषयों की ओर अधिक ध्यान दिया| देश में स्वतंत्रता के बाद एक नई चेतना का विकास हुआ तथा जनमानस ने जो अपेक्षाएं की थी वह भी पूरी नहीं हो सकी, इसलिए स्वार्थपरता, छल कपट, भ्रष्टाचार, अवसरवादीता का ही साम्राज्य हर तरफ दिखाई देता है, बढ़ती हुई जनसंख्या में बेरोजगारी, उससे उत्पन्न तनाव, औद्योगिकरण के कारण जीवन में अनेक समस्याओं का जाल फैला|
महानगरों में जीवन का गिरता स्तर, मूल्यों में हुए परिवर्तन आदि को इस युग के नाटककारों ने अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है| इस काल के नाटक जीवन के यथार्थ से जुड़े हुए हैं और शिल्प के स्तर पर भी नंदी पाठ, भारत वाक्य, प्रस्तावना, गीत, नृत्य आदि कम ही दिखाई देते हैं| सूत्रधार के स्थान पर कमेंटेटर का प्रयोग होना शुरू हो गया था| दो या तीन अंकों में नाटक की समाप्ति इस युग में मिलती है कुल मिलाकर रंगमंच एवं अभिनेता का विशेष ध्यान, जिसका आभाव हमें प्रसाद युग में मिलता है|
इस युग के नाटक कारों में विष्णु प्रभाकर ,,जगदीश चंद्र माथुर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, सुरेंद्र वर्मा, लक्ष्मी नारायण लाल, रामकुमार वर्मा आदि आते हैं| जगदीश चंद्र माथुर इस युग के प्रमुख नाटककारों में से एक हैं| इन्होंने अपने नाटकों के द्वारा रंगमंच को नई दिशा प्रदान की| कोणार्क, पहला राजा आदि इनके प्रसिद्ध नाटक हैं| धर्मवीर भारती और मोहन राकेश, विष्णु प्रभाकर भी इस युग के प्रमुख नाटककारों में आते हैं| धर्मवीर भारती ने अंधा युग, विष्णु प्रभाकर ने डॉक्टर, युगे युगे क्रांति, टूटते परिवेश और मोहन राकेश ने आधे अधूरे, आषाढ़ का एक दिन ,लहरों के राजहंस आदि नाटक लिखें| यह तीनों ही नाटककार इस युग के प्रमुख नाटककार हैं जिन्होंने युगीन समस्याओं के साथ-साथ रंगमंच को दृष्टि में रखते हुए अपने नाटकों की रचना की| इन सबके अतिरिक्त उत्तर आधुनिक युग के नाटककारों में ऐसे बहुत रचनाकार हैं जिन्होंने इस विधा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है और दे रहे हैं| जिसमें दुष्यंत कुमार, रमेश बख्शी, विनोद रस्तोगी, अमृतराय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और भीष्म साहनी का कबीरा खड़ा बाजार में, मृदुला गर्ग का एक और अजनबी, त्रिपुरारी शर्मा का बहू, मीरा कांत का नेपथ्यय राग बहुत महत्हत्वपूर्ण नाटक हैं | ये सब नाटक लिखकर नाटक विधा को समृद्ध कर रहे हैं | आज राष्टीय नाट्य विद्यालय के साथ-साथ अस्मिता थियेटर, एकजुट थियेटर आदि अनेक ग्रुप नाटकों के मंचन और प्रस्तुति में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं|

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