हिंदी उपन्यास का विकास
उपन्यास शब्द का प्रयोग हिंदी में सबसे पहले डॉक्टर माता प्रसाद गुप्त ने 1971 में एक कथा पुस्तक में किया था| किसी व्यक्ति के द्वारा समाज के संपूर्ण जीवन की कथा को प्रस्तुत करने वाली विधा का नाम उपन्यास है| उपन्यास भी कहानी, नाटक की तरह ही आधुनिक काल की गद्य विधा है| इसमें मनुष्य के जीवन के किसी एक पक्ष को नहीं बल्कि विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त किया जाता है| उपन्यास का शाब्दिक अर्थ होता है - वह वस्तु जो निकट रखी हो | उपन्यास में भी व्यक्ति के जीवन के बहुत निकट होता है उसको पढ़कर पाठक उससे अपना तादात्मय स्थापित करता है और उसे लगता है कि यह कृति उनके जीवन की कहानी को प्रस्तुत करती है| उपन्यास आदर्शवादी भी हो सकता है, ऐतिहासिक भी हो सकता है और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर लिखा गया भी हो सकता है
उपन्यास विधा पर भी अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं-
डॉक्टर श्यामसुंदर दास उपन्यास को लेकर कहते हैं कि उपन्यास मनुष्य के वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा है काल्पनिक कथा का अर्थ होता है उस कथा से है जो कल्पना की सहायता से अधिक मार्मिक बना दी गई हो , जिसमें सुंदर शब्दों का चयन किया गया हो और ऐसे शब्द या भाषा जो लेखक की अभिव्यक्ति को व्यक्त कर सकें|
आचार्य नंददुलारे वाजपेई संबंध में लिखते हैं कि उपन्यास आधुनिक युग का महाकाव्य है इसमें मानव जीवन का चित्र उपस्थित किया जाता है| वह मनुष्य के जीवन और चरित्र की व्याख्या करता है|
इन सारी परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि उपन्यास जीवन की वह कथा है जिसमें कल्पना का भी समावेश होता है और कल्पना के साथ-साथ इसमें सत्य को रखने का प्रयास भी किया जाता है |
हिंदी उपन्यास का विकास भी अंग्रेजी के प्रभाव से हुआ है | अंग्रेजी में उपन्यास को नोवल कहा जाता है| इससे मिलता जुलता शब्द 'नवलकथा' गुजराती और मराठी भाषा में भी लिखा जाता है यह शब्द एक तरह से नवीनता का बोध कराता है
सबसे पहले जब हिंदी उपन्यास का आरंभ हुआ था तो मौलिक उपन्यास कम लिखे गए थे ज्यादातर उपन्यास अनुदित थे अर्थात् दूसरी भाषाओं से अनुवाद किया गया था हिंदी भाषा का प्रथम मौलिक उपन्यास कौन सा है? इस पर भी विद्वानों में मतभेद है| जो विवाद है- वह दो उपन्यासों को लेकर है, एक श्रद्धा राम फिल्लौरी का भाग्यवती और दूसरा लाला श्रीनिवास दास का परीक्षा गुरु1882 में प्रकाशित हुआ था और अधिकतर विद्वानों ने इसे ही हिंदी का मौलिक उपन्यास माना है |भाग्यवती उपन्यास की रचना 1877 में हुई थी किंतु उसका प्रकाशन 10 वर्ष के पश्चात 1887 में हुआ था| फिर भी कुछ आलोचक भाग्यवती के रचना समय को आधार बनाकर उसे ही हिंदी का प्रथम उपन्यास मानने के पक्ष में है| इसके अतिरिक्त एक और उपन्यास है जो इस समय लिखा गया वह है गौरी दत्त का 'देवरानी जेठानी की कहानी' कुछ विद्वान इसे भी मौलिकता के आधार हिंदी के पहले उपन्यास का दर्जा देते हैं |अब अंत में कह सकते हैं कि जो अधिकतर विद्वानों का मत है वह यह है कि परीक्षा गुरु ही हिंदी भाषा का सबसे पहला उपन्यास है क्योंकि यह आधुनिक ढंग का लिख गया उपन्यास है और जो उपन्यास के महत्वपूर्ण तत्व होते हैं वह हमें इस उपन्यास में मिलते हैं| उपन्यास की भूमिका में स्वयं लेखक में नई चाल की पुस्तक कहते हुए यह उल्लेख किया है कि इसकी रचना में कहीं ना कहीं अंग्रेजी लेखकों का प्रभाव उन पर पड़ा है| आचार्य रामचंद्र शुक्ल जो हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक हैं उन्होंने भी परीक्षा गुरु को अंग्रेजी ढंग का मौलिक उपन्यास कहा है|
परीक्षा गुरु में विलासी, स्वार्थी व चरित्रहीन मित्रों की संगति के कारण दिवालिया हुए मदन मोहन नामक रईस की कहानी है | संकट के समय उसकी पत्नी और एक मित्र साथ देते हैं जो संकट का समय गुरु बनकर उसमें विवेक को जागृत करते है| दूसरा उपन्यास भाग्यवती में पति के द्वारा त्याग दिए जाने पर अपने संस्कार एवं शिक्षा के बल पर जीवन निर्वाह करती विदुषी नारी का चित्रण किया गया है| उपन्यास के अंत में पति का भ्रम टूटता है और वह शिक्षित समझदार पत्नी का मूल्य समझ उसे अपना लेता है|
हिंदी उपन्यास के विकास को जब हम देखते हैं तो इसको भी हम तीन चरणों में बांट सकते हैं
सबसे पहला चरण है- प्रेमचंद पूर्व हिंदी उपन्यास
प्रेमचंद युग और
तीसरा प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास
प्रेमचंद से पहले जो उपन्यास लिखे गए उनमें सामाजिक एयारी -तिलिस्मी , जासूसी , ऐतिहासिक और भावप्रधान विषयों को लेकर उपन्यास लिखे गए हैं|
इस समय के उपन्यासों को प्रवृत्तियों के आधार पर हम दो भागों में बांट सकते हैं-
समाज सुधार संबंधी उपन्यास और मनोरंजन प्रधान उपन्यास
उससे पहले का जो युग है उस युग में उपन्यास विधा का एक तरह से विकास हो रहा था और इस समय लिखे गए उपन्यासों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने उपन्यास के लिए एक पाठक वर्ग तैयार किया| इनका उद्देश्य पाठक वर्ग का मनोरंजन करना था और यही वह तत्व था जिसने पाठक के एक बड़े वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया और कईयों को तो हिंदी सीखने के लिए भी विवश कर दिया|
समाज सुधार संबंधी विषयों पर भी इस समय उपन्यास लिखे गए| इस युग के उपन्यास कारों में बालकृष्ण भट्ट श्रीनिवास दास राधा कृष्ण गोस्वामी किशोरी लाल गोस्वामी आदि है| देवकीनंदन खत्री का उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति इस समय लिखे गए बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास माने जाते हैं | किशोरी लाल गोस्वामी ने इस समय 65 उपन्यास लिखें राधा कृष्ण दास ने निस्सहाय हिंदू उपन्यास गोवध की समस्या के निवारण को लेकर लिखा
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