अलंकार
अलंकार का अर्थ एवं स्वरूप-
अलंकार
संप्रदाय
संस्कृत
काव्य
शास्त्र
के
छ: सम्प्रदायों
(रस, अलंकार, रीति,ध्वनि,वक्रोक्ति
और
औचित्य में से
सबसे प्राचीनतम संप्रदाय है| अलंकारवादी आचार्य - भामह से प्रारंभ होकर दंडी, रुद्रट, उदभट, अप्पय दिक्षित, केशव,पदमाकर, कुलपति मिश्र आदि सभी अलंकारवादी आचार्य हैं| इन सभी ने काव्य के लिए अलंकार को महत्त्वपूर्ण माना है|
अलंकार
का
शाब्दिक
अर्थ= अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – अलम + कार। अलंकार
का
शाब्दिक
अर्थ ‘आभूषण’
होता
है
अर्थात्
जो
अलंकृत
अथवा
भूषित
करता है,
वह
अलंकार
है
| जिस
प्रकार
आभूषणों
से
नारी
का
लावण्य
अर्थात
सौन्दर्य
बढ़
जाता
है,
उसी
प्रकार
अलंकार
से
कविता
की
शोभा
बढ़
जाती
है
| कहने
का
तात्पर्य
यह
है
कि
शब्द
तथा
अर्थ
की
जिस
विशेषता
से
काव्य
का
श्रृंगार
होता
है
उसे
ही
अलंकार
कहते
हैं|
अलंकार की
व्युत्पत्तिपरक अर्थ='अलंकरोति इति अलंकारः'
(जो
सुशोभित
करता
है,
वही अलंकार
है।) ‘अलंक्रियते अनेन इति अलंकार’ (जिसके
द्वारा
काव्य
की
शोभा
होती
है
अथवा
अलंकृत
किया
जाता
है,
वह
अलंकार
है|) अर्थात अलंकार
काव्य
का
वह
तत्व
है
जो
काव्य
को
सुन्दर
बनाता
है|
लक्षण एवं परिभाषाएं-
भरत- अलंकार
का
सर्वप्रथम
उल्लेख
भरत के
नाट्यशास्त्र
में
मिलता
है
जहाँ उन्होंने
वाचिक
अभिनय
का
चमत्कृत
करने
के
लिए
उपमा,
रूपक,
यमक
और
दीपक
आदि
चार
अलंकारों
का
उल्लेख
मिलता
है|
भामह- काव्यालंकार
ग्रन्थ
में
उनका विवेचन
इतना
व्यवस्थित
है
कि
यह
विश्वास
नहीं
किया
जा
सकता
कि
भामह
ही
अलंकार
के
आदि
प्रतिष्ठापक
रहे
होंगे
| भामह
ने
अलंकारों
को
काव्य
का
प्रमुख
अंग
माना
है
| उनका
मत
है
कि
काव्य
अलंकार
के
बिना
ठीक
उसी
प्रकार
सुशोभित
नहीं
होता
जिस
प्रकार
बिना आभूषणों के
स्त्री
- “न कान्त
मपि
निभूर्षम
विभाति
वनिता
मुखं|”
दंडी-
भामह
के
उपरांत
आचार्य
दंडी
ने
अपने
ग्रन्थ
काव्यादर्श
में
अलंकारों
का
विवेचन
किया
है
| दंडी काफी
उदार
रहे
हैं
|इन्होंने अलंकार
को
काव्य
का शोभाकर
धर्म
माना
हैं
और
कहा
है
की
काव्य
की
शोभा
सर्वथा
अलंकार
के
आश्रित
है
| उन्होंने
लिखा
है- “काव्यशोभाकरान्
धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते |”
वामन- काव्यालंकार
सूत्र
ग्रंथ
के
रचियता
आचार्य
वामन
ने
काव्य-गुणों
को शोभा
का
कारण मानते
हुए
अलंकार
को
सौन्दर्य-वृद्धि
करने
वाला
तत्त्व
बताया
है- ‘काव्य
शोभाया:
कर्तारो
धर्मा:
गुणा:’ (काव्यालंकार
सूत्र)
अलंकार के भेद - अलंकार के
मुख्यत:
तीन
भेद
माने
जाते
हैं-
1.शब्दालंकार- जहाँ
शब्दों
में
सौन्दर्य
अथवा
चमत्कार
निहित
होता
है
और
उनके
स्थान
पर
सामान
अर्थ
वाले
पर्यायवाची
शब्द
रख
देने
से
वह
आकर्षण
नष्ट
हो
जाता
है|
जैसे
- अनुप्रास
, यमक,
श्लेष
, वक्रोक्ति
आदि
अलंकार|
2.अर्थालंकार - जहाँ
अलंकार
का
सौंदर्य
शब्द
पर
निर्भर
न कर
उसके
अर्थ
पर
निर्भर
करता
है
और
उनके
स्थान
पर
सामान
अर्थ
वाले
पर्यायवाची
शब्द
रख
देने
पर
भी
वह
आकर्षण
नष्ट
नहीं
होता
है| जैसे-
उपमा
, उत्प्रेक्षा
, रूपक
आदि |
3.उभयालंकार-
जहाँ
कवि
की
उक्ति
में
शब्द
और
अर्थ
दोनों
का
चमत्कार
समाविष्ट
हो
अत:
ऐसे
स्थलों
पर
एकाधिक
अलंकार
होने के कारण
उभयालंकार
की
स्थिति
मानी
जाती
है|
शब्दालंकार- शब्दालंकार से अभिप्राय है जहां काव्य का सौंदर्य शब्द में निहित होता है और शब्दालंकार में निम्न अलंकार आते हैं- अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
अलंकार का शाब्दिक अर्थ= अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – अलम + कार। अलंकार का शाब्दिक अर्थ ‘आभूषण’ होता है अर्थात् जो अलंकृत अथवा भूषित करता है, वह अलंकार है | जिस प्रकार आभूषणों से नारी का लावण्य अर्थात सौन्दर्य बढ़ जाता है, उसी प्रकार अलंकार से कविता की शोभा बढ़ जाती है | कहने का तात्पर्य यह है कि शब्द तथा अर्थ की जिस विशेषता से काव्य का श्रृंगार होता है उसे ही अलंकार कहते हैं|
अलंकार की व्युत्पत्तिपरक अर्थ='अलंकरोति इति अलंकारः' (जो सुशोभित करता है, वही अलंकार है।) ‘अलंक्रियते अनेन इति अलंकार’ (जिसके द्वारा काव्य की शोभा होती है अथवा अलंकृत किया जाता है, वह अलंकार है|) अर्थात अलंकार काव्य का वह तत्व है जो काव्य को सुन्दर बनाता है|
लक्षण एवं परिभाषाएं-
भरत- अलंकार का सर्वप्रथम उल्लेख भरत के नाट्यशास्त्र में मिलता है जहाँ उन्होंने वाचिक अभिनय का चमत्कृत करने के लिए उपमा, रूपक, यमक और दीपक आदि चार अलंकारों का उल्लेख मिलता है|
भामह- काव्यालंकार ग्रन्थ में उनका विवेचन इतना व्यवस्थित है कि यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि भामह ही अलंकार के आदि प्रतिष्ठापक रहे होंगे | भामह ने अलंकारों को काव्य का प्रमुख अंग माना है | उनका मत है कि काव्य अलंकार के बिना ठीक उसी प्रकार सुशोभित नहीं होता जिस प्रकार बिना आभूषणों के स्त्री - “न कान्त मपि निभूर्षम विभाति वनिता मुखं|”
दंडी- भामह के उपरांत आचार्य दंडी ने अपने ग्रन्थ काव्यादर्श में अलंकारों का विवेचन किया है | दंडी काफी उदार रहे हैं |इन्होंने अलंकार को काव्य का शोभाकर धर्म माना हैं और कहा है की काव्य की शोभा सर्वथा अलंकार के आश्रित है | उन्होंने लिखा है- “काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते |”
वामन- काव्यालंकार सूत्र ग्रंथ के रचियता आचार्य वामन ने काव्य-गुणों को शोभा का कारण मानते हुए अलंकार को सौन्दर्य-वृद्धि करने वाला तत्त्व बताया है- ‘काव्य शोभाया: कर्तारो धर्मा: गुणा:’ (काव्यालंकार सूत्र)
अलंकार के भेद - अलंकार के मुख्यत: तीन भेद माने जाते हैं-
1.शब्दालंकार- जहाँ शब्दों में सौन्दर्य अथवा चमत्कार निहित होता है और उनके स्थान पर सामान अर्थ वाले पर्यायवाची शब्द रख देने से वह आकर्षण नष्ट हो जाता है| जैसे - अनुप्रास , यमक, श्लेष , वक्रोक्ति आदि अलंकार|
2.अर्थालंकार - जहाँ अलंकार का सौंदर्य शब्द पर निर्भर न कर उसके अर्थ पर निर्भर करता है और उनके स्थान पर सामान अर्थ वाले पर्यायवाची शब्द रख देने पर भी वह आकर्षण नष्ट नहीं होता है| जैसे- उपमा , उत्प्रेक्षा , रूपक आदि |
3.उभयालंकार- जहाँ कवि की उक्ति में शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार समाविष्ट हो अत: ऐसे स्थलों पर एकाधिक अलंकार होने के कारण उभयालंकार की स्थिति मानी जाती है|
शब्दालंकार- शब्दालंकार से अभिप्राय है जहां काव्य का सौंदर्य शब्द में निहित होता है और शब्दालंकार में निम्न अलंकार आते हैं- अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
1. अनुप्रास अलंकार-
यह एक शब्दालंकार हैं| जब किसी काव्य को सुंदर बनाने के लिए किसी एक या अधिक वर्णों की बार-बार आवृति होती है तो वहा अनुप्रास अलंकार कहलाता है। किसी विशेष वर्ण की बार-बार आवृति से वाक्य सुनने में सुंदर लगता है। भाषा में लालित्य ,सरसता और संगीत्मकता उत्पन्न हो जाती है | जैसे -
चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में। (वृत्यानुप्रास अलंकार)
दिये गए उदाहरण में ‘च’ वर्ण की बार -बार आवृति हो रही है और आवृति होंने से वाक्य का सौन्दर्य बढ़ रहा है। अतः यह अनुप्रास अलंकार का उदाहरण होगा।
अनुप्रास अलंकार के पांच भेद हैं :
अनुप्रास की परिभाषा में कहा गया है कि जहाँ किसी एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है तो वहाँ पर अनुप्रास अलंकार होता है, अब यह आवृत्ति कितने प्रकार की होती है? किस तरह से होती है, कैसे होती है उसी के आधार पर अनुप्रास के भेद किए गए हैं।
छेका अनुप्रास छेकानुप्रास अलंकार- जहाँ एक या अनेक व्यजनों की एक बार स्पष्टत: एवं क्रमश: आवृति हो। इसमें किसी व्यंजन की या वर्ण की, वर्ण एक भी हो सकता है , दो या तीन वर्ण भी हो सकते हैं, उनकी केवल एक बार ही आवृत्ति होती है, बार-बार आवृत्ति नहीं, केवल एक बार आवृत्ति होती है। जैसे- अति आनंद मगन महतारी राधा के बर बैन सुनी। यहां अति औरआनंद में अ की और मगन, महतारी में म की और बार, बैन में ब की एक बार आवृत्ति हुई है तो यहाँ पर छेका अनुप्रास कहलाएगा|
श्रुत्यानुप्रास अलंकार- जहाँ मुख के उच्चारण स्थान से संबंधित विशिष्ट वर्णों के साम्य हो | हमारे मुख के अंदर विभिन्न उच्चारण अवयव हैं, जब हम स्वरों का उच्चारण करते हैं तो हमारी जिव्हा मुख के अंदर किसी ना किसी भाग से टकराती है, कभी दांत से टकराती है, तो कभी तालु या ओष्टय से टकराती है तो वह जहां हो टकराती है वह उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहलाता है, वर्णों के उच्चारण स्थान जो हैं, वे निश्चित होते हैं तो एक ही उच्चारण स्थान से उच्चारित होने वाले वर्णों का जब किसी चरण में एक साथ प्रयोग किया जाता है जब उनकी आवृत्ति काव्य में सौंदर्य उत्पन्न करती है और तब वह श्रुत्यानुप्रास अलंकार कहलाता है। जैसे- तुलसीदास सीदत निसदिन देखत तुम्हारी निठुराई। (त वर्ग कई वर्ण आ गए हैं , त, द, थ, न आदि सब एक ही स्थान से उच्चरित होते हैं।)
वृत्यानुप्रास अलंकार- जहाँ एक या अनेक व्यंजनों की अनेक बार स्पष्टत: एवं क्रमश: आवृत्ति हो। जब एक वर्ण की एक से अधिक बार आवृत्ति हो तब वहां वृत्यानुप्रास कहलाता है जहां एक या अनेक वर्ण की अनेक बार आती हो तो वहां वृतानुप्रास अलंकार होता है। जैसे- चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में, तो यहाँ च वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है। इसी तरह 'तरनि तनुजा तट तमाल तरूवर बहु छाए।' में त वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है तो यहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार है|
लाटानुप्रास अलंकार- जहाँ शब्द, अर्थ तथा वाक्य की आवृत्ति की हो वहां लाटानुप्रास होता है। जहां समान अर्थ वाले शब्दों की या वाक्यों की आवृत्ति हो तो वहां पर लाटानुप्रास अलंकार होता है। अभी हम बात कर रहे थे वर्णों की, व्यंजनों की एक या बार-बार आवृत्ति की, पर लाटानुप्रास में शब्दों की या पूरे पूरे वाक्य की आवृत्ति होती है किंतु वे अन्वय या स्वर/ व्यंजन बलाघात के कारण वे अलग अर्थ देंते हैं, अर्थात अर्थ में भिन्नता आ जाती है। लाटानुप्रास को उदाहरण से समझे, जैसे पंक्ति है- 'पूत कपूत तो का धन संचय, पूत सपूत तो का धन संचय।' तो दोनों चरणों में सभी शब्द समान हैं, केवल क और स का अंतर है, लेकिन अर्थ में अंतर आ गया। कपूत कहने से अर्थ है नालायक पुत्र और सपूत का मतलब है लायक पुत्र। अर्थ में परिवर्तन आ गया है कि पुत्र यदि लायक है तो जरूरत क्या धन संचय करने की और नालायक है तो फिर भी घन संचय की क्या आवश्यकता है क्योंकि वह सारे पैसे उड़ा देगा। तो इन पंक्तियों में पूरा अर्थ बदल गया है।अन्त्यानुप्रास अलंकार- जहाँ पद के अंत के एक ही वर्ण, एक ही स्वर या व्यंजन की साम्यमूलक आवृत्ति होने से तुक बनती हो। जैसे- अबला जीवन तेरी यही कहनी, आँचल में दूध, आँखों में पानी। यहां चरण के अंत में कहानी और पानी शब्द आया है अतः तुक की समानता है।
यह एक शब्दालंकार हैं| जब किसी काव्य को सुंदर बनाने के लिए किसी एक या अधिक वर्णों की बार-बार आवृति होती है तो वहा अनुप्रास अलंकार कहलाता है। किसी विशेष वर्ण की बार-बार आवृति से वाक्य सुनने में सुंदर लगता है। भाषा में लालित्य ,सरसता और संगीत्मकता उत्पन्न हो जाती है | जैसे -
चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में। (वृत्यानुप्रास अलंकार)
दिये गए उदाहरण में ‘च’ वर्ण की बार -बार आवृति हो रही है और आवृति होंने से वाक्य का सौन्दर्य बढ़ रहा है। अतः यह अनुप्रास अलंकार का उदाहरण होगा।
अनुप्रास अलंकार के पांच भेद हैं :
अनुप्रास की परिभाषा में कहा गया है कि जहाँ किसी एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है तो वहाँ पर अनुप्रास अलंकार होता है, अब यह आवृत्ति कितने प्रकार की होती है? किस तरह से होती है, कैसे होती है उसी के आधार पर अनुप्रास के भेद किए गए हैं।
छेका अनुप्रास छेकानुप्रास अलंकार- जहाँ एक या अनेक व्यजनों की एक बार स्पष्टत: एवं क्रमश: आवृति हो। इसमें किसी व्यंजन की या वर्ण की, वर्ण एक भी हो सकता है , दो या तीन वर्ण भी हो सकते हैं, उनकी केवल एक बार ही आवृत्ति होती है, बार-बार आवृत्ति नहीं, केवल एक बार आवृत्ति होती है। जैसे- अति आनंद मगन महतारी राधा के बर बैन सुनी। यहां अति औरआनंद में अ की और मगन, महतारी में म की और बार, बैन में ब की एक बार आवृत्ति हुई है तो यहाँ पर छेका अनुप्रास कहलाएगा|
श्रुत्यानुप्रास अलंकार- जहाँ मुख के उच्चारण स्थान से संबंधित विशिष्ट वर्णों के साम्य हो | हमारे मुख के अंदर विभिन्न उच्चारण अवयव हैं, जब हम स्वरों का उच्चारण करते हैं तो हमारी जिव्हा मुख के अंदर किसी ना किसी भाग से टकराती है, कभी दांत से टकराती है, तो कभी तालु या ओष्टय से टकराती है तो वह जहां हो टकराती है वह उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहलाता है, वर्णों के उच्चारण स्थान जो हैं, वे निश्चित होते हैं तो एक ही उच्चारण स्थान से उच्चारित होने वाले वर्णों का जब किसी चरण में एक साथ प्रयोग किया जाता है जब उनकी आवृत्ति काव्य में सौंदर्य उत्पन्न करती है और तब वह श्रुत्यानुप्रास अलंकार कहलाता है। जैसे- तुलसीदास सीदत निसदिन देखत तुम्हारी निठुराई। (त वर्ग कई वर्ण आ गए हैं , त, द, थ, न आदि सब एक ही स्थान से उच्चरित होते हैं।)
वृत्यानुप्रास अलंकार- जहाँ एक या अनेक व्यंजनों की अनेक बार स्पष्टत: एवं क्रमश: आवृत्ति हो। जब एक वर्ण की एक से अधिक बार आवृत्ति हो तब वहां वृत्यानुप्रास कहलाता है जहां एक या अनेक वर्ण की अनेक बार आती हो तो वहां वृतानुप्रास अलंकार होता है। जैसे- चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में, तो यहाँ च वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है। इसी तरह 'तरनि तनुजा तट तमाल तरूवर बहु छाए।' में त वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है तो यहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार है|
लाटानुप्रास अलंकार- जहाँ शब्द, अर्थ तथा वाक्य की आवृत्ति की हो वहां लाटानुप्रास होता है। जहां समान अर्थ वाले शब्दों की या वाक्यों की आवृत्ति हो तो वहां पर लाटानुप्रास अलंकार होता है। अभी हम बात कर रहे थे वर्णों की, व्यंजनों की एक या बार-बार आवृत्ति की, पर लाटानुप्रास में शब्दों की या पूरे पूरे वाक्य की आवृत्ति होती है किंतु वे अन्वय या स्वर/ व्यंजन बलाघात के कारण वे अलग अर्थ देंते हैं, अर्थात अर्थ में भिन्नता आ जाती है। लाटानुप्रास को उदाहरण से समझे, जैसे पंक्ति है- 'पूत कपूत तो का धन संचय, पूत सपूत तो का धन संचय।' तो दोनों चरणों में सभी शब्द समान हैं, केवल क और स का अंतर है, लेकिन अर्थ में अंतर आ गया। कपूत कहने से अर्थ है नालायक पुत्र और सपूत का मतलब है लायक पुत्र। अर्थ में परिवर्तन आ गया है कि पुत्र यदि लायक है तो जरूरत क्या धन संचय करने की और नालायक है तो फिर भी घन संचय की क्या आवश्यकता है क्योंकि वह सारे पैसे उड़ा देगा। तो इन पंक्तियों में पूरा अर्थ बदल गया है।अन्त्यानुप्रास अलंकार- जहाँ पद के अंत के एक ही वर्ण, एक ही स्वर या व्यंजन की साम्यमूलक आवृत्ति होने से तुक बनती हो। जैसे- अबला जीवन तेरी यही कहनी, आँचल में दूध, आँखों में पानी। यहां चरण के अंत में कहानी और पानी शब्द आया है अतः तुक की समानता है।
2. यमक
अलंकार
- यह
भी
एक
शब्दालंकार हैं | जिसका
अर्थ
है
- युग्म
अथवा
जोड़ा
| जहाँ
एक
जैसे
शब्दों
की
आवृति
हो
लेकिन
भिन्न-भिन्न
अर्थ
दे
रहें हो , वहां
यमक
अलंकार
होता
है
| जैसे
-‘कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय। या खाए बौरात नर या पा बौराय।’ इसमें
‘कनक’ शब्द
का
प्रयोग
दो
बार
हुआ
है।
प्रथम
कनक
का
अर्थ
‘सोना’ और
दुसरे
कनक
का
अर्थ
‘धतूरा’ है।
अतः
‘कनक’ शब्द
का
दो
बार
प्रयोग
और
भिन्नार्थ
के
कारण
उक्त
पंक्तियों
में
यमक
अलंकार
की
छटा
दिखती
है। यमक
अलंकार
के
दो
भेद
हैं- 1. अभंग
- जहाँ
सम्पूर्ण
शब्द
की
भिन्न
अर्थ
में
आवृति
होती
है| उदाहरण से समझिए- 'तो पर बारौं उरबसी सुनी राधिके सुजानतू मोहन के उरबसी ह्वै उरबसी समान।' यहां उरबसी के तीन भिन्न अर्थ हैं - पहला उर्वशी नामक अप्सरा, दूसरा ह्रदय में बसी हुई, और तीसरा गले में पहनने वाला आभूषण 2. सभंग
-जहाँ
शब्द
के
किसी
भाग
की
आवृति
होती
है
| और जहाँ शब्द को तोड़कर या संधि विच्छेद से भिन्न अर्थ निकले, उदाहरण से समझिए- 'नेह सरसावन में मेह बरसावन में सावन में झूलिबो सुहावनो लगत हैं।' यहां सावन शब्द का प्रयोग तीन बार हुआ है, किंतु सरसावन बरसावन में शब्द तोड़कर सावन शब्द लेना पड़ता है। इसलिए यहां पर सभंग यमक अलंकार है।
3 .श्लेष अलंकार- श्लेष
का
अर्थ
होता
है
चिपका
हुआ
या
मिला
हुआ। जब एक ही शब्द
में
हमें
अनेक
अर्थ
मिलते
हों,
या
जब
किसी
शब्द
का
प्रयोग
एक
बार
ही
किया
जाता
है
लेकिन
उससे
अर्थ
कई
निकलते
हैं,
तब उस समय श्लेष
अलंकार
होता
है।
जैसे: रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून। यहाँ
रहीम
ने
पानी
को
तीन
अर्थों
में
प्रयोग
किया
है
: पानी
का
पहला
अर्थ
मनुष्य
के
संदर्भ
में - विनम्रता
से
है| पानी
का
दूसरा
अर्थ
मोती
के
सन्दर्भ
में
आभा, तेज या चमक
से
है| पानी
का
तीसरा
अर्थ
जल
से
है
,जिसे
चून
से
जोड़कर
दर्शाया
गया
है। श्लेष
अलंकार
के
भी
दो
भेद
हैं
- 1.अभंग
(एक
सम्पूर्ण
शब्द
से
, एक
बार
प्रयुक्त
होने
पर
भी
एकाधिक
अर्थ
निकलते
हों
|) जैसे-जो रहीम गति दीप की कुल कपूत की सोय बारे उजियारे करें, बढ़े अंधेरो होय यहां बारे, उजियारे, बढे,अंधेरों शब्दों में श्लेष है। कवि दीपक और कपूत का वर्णन कर रहा है कि जैसे दीपक को जब जलाते हैं तो हर तरफ प्रकाश फैल जाता है और जब दीपक बढ़ता है अर्थात बुझ जाता है तो अंधेरा हो जाता है और ऐसे ही कपूत की स्थिति होती है घर में जब वह पुत्र पैदा होता है तो खुशियां मनाई जाती हैं , मिठाई बांटी जाती है और जैसे-जैसे वह बड़ा होता है और उसके बुरे कामों का पता चलता है तो बहुत दुःख होताहै अर्थात जिसे घर का चिराग समझा जाता था, बड़ा होने पर वह उस घर को प्रकाश देने वाला अर्थात उस घर के यश व समृद्धि को बढ़ाने वाला नहीं साबित हुआ । बारे का एक अर्थ होता है बाल्यकाल और दूसरा अर्थ होता है जलाना, उजियारे का अर्थ होता है माता-पिता को आनंदित करना और दूसरा अर्थ होता है प्रकाश करना बड़े का एक अर्थ होता है बड़ा होना और दूसरा अर्थ होता है बुझ जाना, अंधेरों का एक अर्थ होता है दुख और दूसरा होता है अंधकार , तो यहां शब्दों को बिना तोड़े, बिना अलग-अलग किए यहाँ अलग-अलग अर्थों की प्रतीति हो रही है| इसलिए यहां पर अभंग श्लेष अलंकार है। 2. सभंग- (एक
बार
प्रयुक्त
शब्द
के
टुकड़े
करके
एकाधिक
अर्थ
की
प्राप्ति
|) उदाहरण देखिए-चिर जीवौ जोरी जुरै क्यों न स्नेह गंभीर को घटि ए वृषभानुजा , वे हलधर के वीर (बिहारी ) यहां वृषभानु जा और हलधर के वीर शब्दों में श्लेष अलंकार है और इन दोनों शब्दों को तोड़कर ही या अलग अलग करके ही हम अलग-अलग अर्थों को ले सकते हैं। बिना तोड़े भिन्न भिन्न अर्थों की प्रतीति नहीं हो सकती। इसलिए यहां पर सभंग अलंकार है|
4. वक्रोक्ति अलंकार- वक्रोक्ति में काकु या श्लेष के द्वारा वक्ता वाक्य का अभिप्रेत अर्थ ग्रहण न कर श्रोता उससे कोई अन्य अर्थ ग्रहण करता है। अर्थात जहाँ श्रोता द्वारा किसी उक्ति का अर्थ जान-बूझकर वक्ता के अभिप्राय से अलग लिया जाता है, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण- 'एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहां पर है उसने कहा अ पर कैसा वह उड़ गया सपर है|' (ये उदाहरण श्लेष वक्रोक्ति अलंकार का है) अथवा 'मैं सुकुमारी, नाथ बन जोगु ।तुम ही उचित तप, मो कहँ भोगू|' (ये उदाहरण काकु वक्रोक्ति अलंकार का है) वक्रोक्ति अलंकार के दो भेद हैं-1 श्लेष वक्रोक्ति अलंकार 2 काकु वक्रोक्ति अलंकार|
5. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार- पुनरुक्ति प्रकाश में शब्द दो बार आया है तो अर्थ एक ही हो या लिया जाता है|उदहारण - 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय ' यहाँ पढ़ि पढ़ि शब्द दो बार आया है दोनों बार पढ़ने के अर्थ में ही आया है, अर्थात जहाँ शब्द क्रमशः दो बार शब्द आये और उस शब्द काअलग अलग अर्थ न होकर एक ही अर्थ निकलता हो, वहां पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार होता है |
अर्थालंकार-
जहाँ
अलंकार
का
सौंदर्य
शब्द
पर
निर्भर
न कर
उसके
अर्थ
पर
निर्भर
करता
है
और
उनके
स्थान
पर
सामान
अर्थ
वाले
पर्यायवाची
शब्द
रख
देने
पर
भी
वह
आकर्षण
नष्ट
नहीं
होता
है|
अर्थालंकारों
के
उपभेद-
- समानतामुलक
अथवा
सादृश्य
मूलक
अर्थालंकार-मूल
में
उपमेय
और
उपमान
की
समता
सादृश्य
का
भाव | उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, उपमेयोपमा|
- विरोध
मूलक
अर्थालंकार-
परस्पर
विरोध
का
आभास
होता
है
किन्तु
वास्तव
में
विरोध
नहीं
होता|
- श्रंखलामूलक
अर्थालंकार-
वस्तुओं
आदि
का
क्रमिक, श्रंखला
बद्ध
वर्णन
होता
है|
- न्याय
मूलक
अर्थालंकार-
तर्क,
उदहारण, लोक-प्रमाण
के
माध्यम
से
कथन
में
रोचकता
का
विधान
होता
है|
- व्यंग्यार्थ
मूलक
अर्थालंकार- वाच्यार्थ
की
अपेक्षा
व्यग्यार्थ
की
प्रतीति
पर
बल
रहता
है|
समानतामुलक
अथवा
सादृश्य
मूलक
अर्थालंकार
1.उपमा
अर्थालंकार- उपमा
के
अंग
- उपमेय,
उपमान
,साधारण
धर्म
, वाचक
शब्द
|उपमा के मुख्य रूप से तीन भेद किए जाते हैं - 1.पूर्णोपमा -जहां उपमा के चारों अंगों का उल्लेख किया जाए जैसे सीता का मुख चंद्रमा के समान सुंदर है यहां पर सीता उसमें है चंद्रमा उपमान है समान वाचक शब्द है और सुंदर साधारण धर्म है| 2.लुप्तोपमा- जहां पर इन चारों अंगों में से किसी एक या दो अंगो का या तीन अंगों का उल्लेख न किया जाए तो वहां पर लुप्तोपमा अलंकार होगा जैसे- सीता का मुख चंद्रमा के समान है। यहां साधारण धर्म सुंदर का लोप हो गया है इसलिए यहां पर लुप्तोपमा अलंकार है। 3. मालोपमा- जहां पर एक उपमेय की अनेक उपमानों से समानता दिखाई जाए अर्थात एक उपमेय के लिए अनेक उपमानों का प्रयोग किया जाए तो वहां पर मालोपमा अलंकार होता है जैसे सीता का मुख कमल, चंद्रमा और रति के समान सुंदर है। यहां मुख उपमेय की सुंदरता की तुलना तीन उपमानो कमल, चंद्रमा और रति से की गई है इसलिए यहां पर मलोपमा अलंकार है। अनेक उपमानों की एक माला सी बन जाती है।
2. उपमेयोपमा -जहां उपमेय और उपमान एक दूसरे के उपमान और उपमेय बन जाते हैं, अर्थात दो वस्तुओं को एक दूसरे के सदृश इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके समान कोई तीसरी वस्तु नहीं होती| जैसे- रमणी- मुख शशि तुल्य है, शशि रमणी मुख तुल्य| इसी तरह से एक उदाहरण और देखते हैं- भरत राम सम, राम भरत सम| इस अलंकार में पहले जो उपमेय होता है वह अगले चरण में उपमान बन जाता है और जो परम चरण में उपमान होता है वह अगले चरण में उपमेय बन जाता है |
3. उत्प्रेक्षा अलंकार- उत्प्रेक्षा अलंकार में उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है कवि जहाँ अपने काव्य में चमत्कार लाने या सौंदर्य लाने के लिए उपमेय में उपमान की कल्पना कर लेता है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। उत्प्रेक्षा अलंकार कवि की कल्पना से अधिक जुड़ा हुआ है। जहां गुण, धर्म आदि के आधार पर भिन्नता जानते हुए भी कि उपमान और उपमेय भिन्न है, तो भी उपमेय में उपमान की संभावना जहां की जाती है वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है और उत्प्रेक्षा अलंकार में वाचक शब्द इव, जनों, जानो, मनो, मानो, ज्यों, जैसे, जनु आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। एक उदाहरण से समझते हैं। 'नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग, खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघ बन बीच गुलाबी रंग।' यहाँ पहली दो पंक्तियों में उपमेय अर्थात प्रस्तुत का वर्णन है आगे की दो पंक्तियों में अप्रस्तुत का वर्णन है। कवि यहां श्रद्धा के सौंदर्य को लेकर कल्पना करता है कि जैसे वह बादलों के बीच बिजली का गुलाबी रंग का फूल है। यहाँ ज्यों वाचक शब्द है श्रद्धा के परिघान और सौंदर्य को लेकर कल्पना करता है। वस्तु, हेतु या कारण और फल के आधार पर उत्प्रेक्षा के तीन भेद किये गए हैं| 1.वस्तूत्प्रेक्षा - जहाँ एक वस्तु में दूसरी वस्तु की सम्भावना या कल्पना की जाए। जैसे- 'सोहत ओढ़े पीत पट श्याम सलोने गात।मनहुँ नील मनि सैल पर आतप परयौ प्रभात।' कृष्ण के सौंदर्य का वर्णन है और उनका कैसा रंग है -साँवला रंग है तो स्याम सलोने रंग पर पीले वस्त्र ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे प्रभात काल की धूप हो इस समय की धूप सुखदायक होती है और प्रभु का रूप भी सुखदायक है। 2.हेतूत्प्रेक्षा- हेतु से अभिप्राय है कारण। जहां अकारण में कारण की संभावना की जाए इसमें वस्तु का कार्य स्वाभाविक होता है परन्तु उसे कारण मान लिया जाता है।जैसे अरुण भये कोमल चरण भुवि चलने ते मानु। यहाँ धरती पर चलने के कारण प्रभु के कोमल चरण मानो लाल हो गए हैं देखिए यहाँ पर चारणों के लाल होने का कारण धरती पर चलना माना गया है जबकि चरण तो लाल ही होते हैं अतः अकारण में कारण मान लिया गया है। 3.फलोत्प्रेक्षा- जो वास्तव में फल न हो उसको फल मानकर उत्प्रेक्षा की जाए जैसे- ताड का वृक्ष मानों आकाश को छूने के लिए लम्बा हो गया है। एक और उदाहरण देखते हैं - 'नित्य ही नहाता है चंद्रमा क्षीर सागर में| सुंदरी! मानो तुम्हारे मुख की समता के लिए।' यहाँ चन्द्रमा नित्य ही अस्त होता है क्षीर सागर में ,लेकिन कवि कल्पना करता है कि हे सुंदरी! चंद्रमा तुम्हारे मुख सौंदर्य से समता करने के लिए अर्थात तुम्हारे जितना सुंदर बनने के लिए हर रोज सागर में नहाने जाता है।
अर्थालंकारों
के
उपभेद-
- समानतामुलक अथवा सादृश्य मूलक अर्थालंकार-मूल में उपमेय और उपमान की समता सादृश्य का भाव | उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, उपमेयोपमा|
- विरोध मूलक अर्थालंकार- परस्पर विरोध का आभास होता है किन्तु वास्तव में विरोध नहीं होता|
- श्रंखलामूलक अर्थालंकार- वस्तुओं आदि का क्रमिक, श्रंखला बद्ध वर्णन होता है|
- न्याय मूलक अर्थालंकार- तर्क, उदहारण, लोक-प्रमाण के माध्यम से कथन में रोचकता का विधान होता है|
- व्यंग्यार्थ मूलक अर्थालंकार- वाच्यार्थ की अपेक्षा व्यग्यार्थ की प्रतीति पर बल रहता है|
3. रूपक
अलंकार-
जब
गुण
की
अत्यंत समानता
के
कारण
उपमेय
को
ही
उपमान
बता
दिया
जाए
यानी
उपमेय
पर
उपमान
का
अभेद
आरोप
कर
दिया
जाता
है,
तब
वह
रूपक
अलंकार
कहलाता
है।
रूपक
अलंकार
में
उपमान
और
उपमेय
में
कोई
अंतर
नहीं
दिखायी
पड़ता
है
जैसे
- 'बीती विभावरी जागरी ! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा घाट उषा नगरी'। -जयशंकर प्रसाद| रूपक अलंकार
के
भेद
-1.निरंग
रूपक- निरंग रूपक में उपमेय में अन्य अंगों के बिना उपमान का आरोप होता है जैसे - 'लोचन कमल खिल गए सहसा|' 2.सांग
रूपक- सॉन्ग का अर्थ होता है स+ अंग अर्थात संबद्ध वस्तुओं के साथ या सहित। सांग रूपक में प्रधान उपमेय के ऊपर ही नहीं बल्कि उसके अंगों पर भी उपमान और उसके अंगों का आरोप किया जाता है। जैसे- "बीती विभावरी जाग री।अंबर पनघट में डुबो रही, तारा घट उषा नागरी।" यहां दिए गए उदाहरण में उषा उपमेय और उसके अंगों पर नागरी उपमान का अंगों सहित आरोप किया गया है। उषा के अंग अंबर, तारा उपमेय हैं और पनघट व घट का उपमान के रूप में वर्णन किया गया है। इसलिए उषा का अंग सहित वर्णन होने से यहां सांग रूपक है। इसी तरह से सांग रूपक का एक और उदाहरण देखा जा सकता है- "उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग| बिकसे संत सरोज सब हरसे लोचन भृंग।" (तुलसीदास) यहां राम उपमेय है और उनसे संबंधित अन्य वस्तुओं जैसे मंच संत लोचन सभी में उपमान के रूप में बाल सूर्य और उदयाचल कमल भवरें का आरोप भी किया गया है इसलिए यहां सांग रूपक है। 3. परम्परित
रूपक- जहाँ एक आरोप दूसरे आरोप का कारण बन जाये यहाँ दो रूपकहोते हैं और दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए होकर एक रूपक दूसरे रूपक का कारण बन जाता है।
व्यतिरेक अलंकार= व्यतिरेक का अर्थ होता है उत्कृष्ट अर्थात जहाँ किसी गुण विशेष या किसी विशेष योग्यता के कारण उपमान को श्रेष्ठ या उत्तम बताया जय तब वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। देखिए हम हमेशा उपमान को उपमेय से श्रेष्ठ बताते हैं लेकिन व्यतिरेक अलंकार में हम उल्टा पाते हैं अर्थात उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ । अर्थात मुख को चंद्रमा से भी श्रेष्ठ बताए जैसे - "स्वर्ग कि तुलना उचित ही है यहाँ, किन्तु सुर सरिता कहाँ सरयू कहाँ।"
जब गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय को ही उपमान बता दिया जाए यानी उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप कर दिया जाता है, तब वह रूपक अलंकार कहलाता है। रूपक अलंकार में उपमान और उपमेय में कोई अंतर नहीं दिखायी पड़ता है जैसे - 'बीती विभावरी जागरी ! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा घाट उषा नगरी'। -जयशंकर प्रसाद| रूपक अलंकार के भेद -1.निरंग रूपक- निरंग रूपक में उपमेय में अन्य अंगों के बिना उपमान का आरोप होता है जैसे - 'लोचन कमल खिल गए सहसा|' 2.सांग रूपक- सॉन्ग का अर्थ होता है स+ अंग अर्थात संबद्ध वस्तुओं के साथ या सहित। सांग रूपक में प्रधान उपमेय के ऊपर ही नहीं बल्कि उसके अंगों पर भी उपमान और उसके अंगों का आरोप किया जाता है। जैसे- "बीती विभावरी जाग री।अंबर पनघट में डुबो रही, तारा घट उषा नागरी।" यहां दिए गए उदाहरण में उषा उपमेय और उसके अंगों पर नागरी उपमान का अंगों सहित आरोप किया गया है। उषा के अंग अंबर, तारा उपमेय हैं और पनघट व घट का उपमान के रूप में वर्णन किया गया है। इसलिए उषा का अंग सहित वर्णन होने से यहां सांग रूपक है। इसी तरह से सांग रूपक का एक और उदाहरण देखा जा सकता है- "उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग| बिकसे संत सरोज सब हरसे लोचन भृंग।" (तुलसीदास) यहां राम उपमेय है और उनसे संबंधित अन्य वस्तुओं जैसे मंच संत लोचन सभी में उपमान के रूप में बाल सूर्य और उदयाचल कमल भवरें का आरोप भी किया गया है इसलिए यहां सांग रूपक है। 3. परम्परित रूपक- जहाँ एक आरोप दूसरे आरोप का कारण बन जाये यहाँ दो रूपकहोते हैं और दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए होकर एक रूपक दूसरे रूपक का कारण बन जाता है।
व्यतिरेक अलंकार= व्यतिरेक का अर्थ होता है उत्कृष्ट अर्थात जहाँ किसी गुण विशेष या किसी विशेष योग्यता के कारण उपमान को श्रेष्ठ या उत्तम बताया जय तब वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। देखिए हम हमेशा उपमान को उपमेय से श्रेष्ठ बताते हैं लेकिन व्यतिरेक अलंकार में हम उल्टा पाते हैं अर्थात उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ । अर्थात मुख को चंद्रमा से भी श्रेष्ठ बताए जैसे - "स्वर्ग कि तुलना उचित ही है यहाँ, किन्तु सुर सरिता कहाँ सरयू कहाँ।"
अपह्नुति अलंकार
जब किसी वस्तु या बात को छिपा कर उसके स्थान पर किसी अन्य झूठी वस्तु या बात की स्थापना की जाती है तो वहाँ पर अपहनुति अलंकार होता है। हम कह सकते हैं कि उपमेय का निषेध करके उसके स्थान पर उपमान का आरोप करने पर अपहनुति अलंकार होता है। जैसे-
बन्धु न होय मोर यह काला। यहाँ सुग्रीव ने राम से अपने भाई बाली के विषय में सच्ची बात अर्थात उसका बन्धु होना या भाई होना छिपाया और कहा कि यह मेरा काल है ..यह झुठ की स्थापना की गई है।अपह्नुति अलंकार के छ: भेद हैं -
शुद्धापहनुति
हेत्वापहनुति
पर्यस्तापहनुति
भ्रांतापहनुति
छेकापहनुति
कैतवापहनुति
अतिश्योक्ति अलंकार-
अतिश्योक्ति में किसी कथन को सामान्य रूप में प्रस्तुत न कर उसे बहुत बाधा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है , अर्थात जब किसी वस्तु, व्यक्ति आदि का वर्णन बहुत बाधा चढ़ा कर किया जाए तब वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है।वहां अतिश्योक्ति अलंकार होता है |जैसे- ‘हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग।’
अतिश्योक्ति अलंकार के भेद-
रूपकातिश्योक्ति
भेदकातिश्योक्ति
संबंधातिश्योक्ति
अक्रमतिश्योक्ति
चपलातिश्योक्ति
अत्यंतातिश्योक्ति
निदर्शना अलंकार-
निदर्शना का अर्थ होता है- कुछ रचकर दिखाना | जब उपमेय और उपमान में सादृश्यॉ का आरोप कर दोनों में बिंब-प्रतिबिंब का भाव प्रकट किया जाए| अथवा जब दो वस्तुओं या दो कार्यों को उनकी समानता सूचित करने के लिए एक बताया जाए जबकि वे एक हो तो निदर्शना अलंकार है|
विरोधाभास अलंकार-
जहाँ विरोध न होने पर भी कथन में विरोध की प्रतीति हो, किन्तु अर्थ को समझने के उपरांत उस विरोध की प्रतीति समाप्त हो जाये वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है|जैसे- या अनुरागी चित्त की गति समुझै नहिं कोइ। ज्यौं-ज्यौं बूड़ै स्याम रँग त्यौं-त्यौं उज्जल होइ’ (बिहारी)|
विभावना अलंकार-
विभावना का अर्थ है -विशेष प्रकार का विचार | जहाँ कारण के अभाव में कार्य के होने का वर्णन हो वहां विभावना अलंकार होता है जैसे -'निदंक नियरे राखिये आंगन कुटि छबाय, बिनु पानी बिनु साबुना निर्मल करे सुभाय'- (संत कबीरदास)
विशेषोक्ति अलंकार-
जहाँ प्रसिद्ध कारण के विद्यमान होने पर भी कार्य के न होने का वर्णन हो वहां विशेषोक्ति अर्थालंकार होता है| जैसे - "देखो दो-दो मेघ बरसते, मैं प्यासी की प्यासी।"
अत्युक्ति अलंकार-
इस अलंकार में रोचकता लाने के लिए किसी योग्य पुरुष के विषय में बढ़ी-चढ़ी हुई झूठी बात कही जाती है | तब अत्युक्ति अलंकार होता है | इस अलंकार के वीरता, सुन्दरता , उदारता , कीर्ति की अत्युक्ति आदि भेद किए जाते हैं |
अभ्यास के लिए प्रश्न-
1.अलंकार से आप क्या समझते हैं ? किन्हीं दो शब्दालंकारों और दो अर्थालंकारों का उल्लेख कीजिए|
2. संस्कृत के अलंकारवादी आचार्यों द्वारा दी गई अलंकार की परिभाषाओं या लक्षणों पर प्रकाश डालिए |
3. शब्दालंकार की परिभाषा बताते हुए प्रमुख शब्दालंकारों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए| 4.अर्थालंकार की परिभाषा बताते हुए प्रमुख अर्थालंकारों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए|
5.किन्हीं तीन अलंकारों के लक्षण-उदाहरण लिखिए- अनुप्रास अलंकार, वक्रोक्ति अलंकार, श्लेष अलंकार, रूपक अलंकार, विभावना अलंकार|
सन्दर्भ ग्रंथ सूची -
भारतीय काव्यशास्त्र , डॉ. सत्यदेव चौधरी
भारतीय काव्यशास्त्र , डॉ. हर्ष बाला शर्मा
भारतीय काव्यशास्त्र , सत्य नारायण शर्मा
बन्धु न होय मोर यह काला। यहाँ सुग्रीव ने राम से अपने भाई बाली के विषय में सच्ची बात अर्थात उसका बन्धु होना या भाई होना छिपाया और कहा कि यह मेरा काल है ..यह झुठ की स्थापना की गई है।अपह्नुति अलंकार के छ: भेद हैं -
शुद्धापहनुति
हेत्वापहनुति
पर्यस्तापहनुति
भ्रांतापहनुति
छेकापहनुति
कैतवापहनुति
अतिश्योक्ति अलंकार-
अतिश्योक्ति में किसी कथन को सामान्य रूप में प्रस्तुत न कर उसे बहुत बाधा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है , अर्थात जब किसी वस्तु, व्यक्ति आदि का वर्णन बहुत बाधा चढ़ा कर किया जाए तब वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है।वहां अतिश्योक्ति अलंकार होता है |जैसे- ‘हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग।’
अतिश्योक्ति अलंकार के भेद-
रूपकातिश्योक्ति
भेदकातिश्योक्ति
संबंधातिश्योक्ति
अक्रमतिश्योक्ति
चपलातिश्योक्ति
अत्यंतातिश्योक्ति
निदर्शना अलंकार-
निदर्शना का अर्थ होता है- कुछ रचकर दिखाना | जब उपमेय और उपमान में सादृश्यॉ का आरोप कर दोनों में बिंब-प्रतिबिंब का भाव प्रकट किया जाए| अथवा जब दो वस्तुओं या दो कार्यों को उनकी समानता सूचित करने के लिए एक बताया जाए जबकि वे एक हो तो निदर्शना अलंकार है|
विरोधाभास अलंकार-
जहाँ विरोध न होने पर भी कथन में विरोध की प्रतीति हो, किन्तु अर्थ को समझने के उपरांत उस विरोध की प्रतीति समाप्त हो जाये वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है|जैसे- या अनुरागी चित्त की गति समुझै नहिं कोइ। ज्यौं-ज्यौं बूड़ै स्याम रँग त्यौं-त्यौं उज्जल होइ’ (बिहारी)|
विभावना अलंकार-
विभावना का अर्थ है -विशेष प्रकार का विचार | जहाँ कारण के अभाव में कार्य के होने का वर्णन हो वहां विभावना अलंकार होता है जैसे -'निदंक नियरे राखिये आंगन कुटि छबाय, बिनु पानी बिनु साबुना निर्मल करे सुभाय'- (संत कबीरदास)
विशेषोक्ति अलंकार-
जहाँ प्रसिद्ध कारण के विद्यमान होने पर भी कार्य के न होने का वर्णन हो वहां विशेषोक्ति अर्थालंकार होता है| जैसे - "देखो दो-दो मेघ बरसते, मैं प्यासी की प्यासी।"
अत्युक्ति अलंकार-
इस अलंकार में रोचकता लाने के लिए किसी योग्य पुरुष के विषय में बढ़ी-चढ़ी हुई झूठी बात कही जाती है | तब अत्युक्ति अलंकार होता है | इस अलंकार के वीरता, सुन्दरता , उदारता , कीर्ति की अत्युक्ति आदि भेद किए जाते हैं |
अभ्यास के लिए प्रश्न-
1.अलंकार से आप क्या समझते हैं ? किन्हीं दो शब्दालंकारों और दो अर्थालंकारों का उल्लेख कीजिए|
2. संस्कृत के अलंकारवादी आचार्यों द्वारा दी गई अलंकार की परिभाषाओं या लक्षणों पर प्रकाश डालिए |
3. शब्दालंकार की परिभाषा बताते हुए प्रमुख शब्दालंकारों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए| 4.अर्थालंकार की परिभाषा बताते हुए प्रमुख अर्थालंकारों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए|
5.किन्हीं तीन अलंकारों के लक्षण-उदाहरण लिखिए- अनुप्रास अलंकार, वक्रोक्ति अलंकार, श्लेष अलंकार, रूपक अलंकार, विभावना अलंकार|
सन्दर्भ ग्रंथ सूची -
भारतीय काव्यशास्त्र , डॉ. सत्यदेव चौधरी
भारतीय काव्यशास्त्र , डॉ. हर्ष बाला शर्मा
भारतीय काव्यशास्त्र , सत्य नारायण शर्मा
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