‘रीतिकाल’
हिंदी साहित्य के इतिहास को विभिन्न विद्वानों ने मुख्यतः चार भागों में बांटा है- आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल| रीतिकाल संवत 1700 से 1900 विक्रमी तक माना गया है| इसे उत्तर मध्य काल भी कहा गया है| आदिकाल की तरह ही इस कालखंड के नामकरण को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है| उन्होंने रीतिकाल को कई नाम दिए हैं, अलंकरण की प्रधानता के कारण मिश्र बंधुओं ने इसे ‘अलंकृत काल’ नाम दिया है, पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ‘श्रृंगार काल’ ,रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने ‘कला काल’ और आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे रीतिकाल कहा है| इन सभी नामों के पीछे विद्वानों ने अपने-अपने तर्क दिए हैं| मिश्र बंधुओं का तर्क था- “इस युग में कविता को अलंकृत करने की परिपाटी अधिक थी|”१ रीतिकालीन प्रवृतियों को देखते हुए यह तर्क बिलकुल सही है| परन्तु यह भी सत्य है कि यह नाम रीतिकाल की सभी विशेषताओं को इंगित नहीं करता| बच्चन सिंह लिखते हैं- “यह तर्क अपने आप में निर्मूल नहीं है जिसे सहसा अस्वीकृत कर दिया जाए| रीतिकालीन काव्यों के अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अलंकार की प्रवृत्ति इस युग की प्रमुख प्रवृत्तियों में से एक थी| किंतु यह सर्वप्रमुख नहीं थी| कवियों की दृष्टि रस एवं भाव की ओर भी थी| रीतिमुक्त काव्यों तथा वीर रस की कविताओं में भावों की ही मूल प्रेरणा है, तथा मुख्य लक्ष्य भावाभिव्यक्ति है|”२ पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने रीतिकाल का नाम ‘श्रृंगार काल’ सुझाया है| “रीतिकाल की काव्य प्रवृत्तियों को देखते हुए यह नाम अधिक वजनदार प्रतीत होता है”३ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी इस नाम को स्वीकृति दी है| डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं “जहां तक शेष दो विशेषणों ‘रीति’ और ‘श्रृंगार’ का प्रश्न है- वे दोनों ही अपने-अपने स्थानों पर महत्वपूर्ण हैं |
इस युग के लिए ‘रीति’ विशेषण का प्रयोग करने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक ने इसे श्रृंगार काल कहे जाने पर आपत्ति प्रकट नहीं की| किंतु, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इस युग को श्रृं’गारकाल’ कहना सर्वथा समीचीन है| इस नाम के पक्ष में जो यह तर्क दिया जाता है कि इस युग के कवियों की व्यापक प्रवृत्ति श्रृंगार-वर्णन की थी, उसके स्वीकार किए जाने में आपत्ति की जा सकती है| क्योंकि इसमें संदेह नहीं कि इस युग में अधिकांश रचनाएं श्रृंगारिक ही हैं, लेकिन ये भी सत्य है कि ये रचनाएं आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए लिखी गई थी। इसका प्रेरक तत्व कवियों की कामवासना नहीं ‘अर्थ’ है; जो विलासी आश्रयदाताओं से इस प्रकार के काव्य की रचना करके ही प्राप्त किया जा सकता था|”३ इसलिए इसे श्रृंगार काल कहना न्यायसंगत नही लगता। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को ‘रीतिकाल’ नाम दिया है| रीतिकाल से मिलता-जुलता रीतिकाव्य शब्द शुक्ल से पूर्व ग्रियर्सन ने भी इस काल के लिए प्रयोग किया है| उन्होंने अपने साहित्य “मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान के सातवें अध्याय में इस युग को रीति काव्य कहा है|”४ इस प्रकार सभी नामों और तर्कों पर विचार करने के उपरांत अंत में आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा दिया गया ‘रीतिकाल’ नाम ही अधिक संगत प्रतीत होता है|
इस युग के लिए ‘रीति’ विशेषण का प्रयोग करने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक ने इसे श्रृंगार काल कहे जाने पर आपत्ति प्रकट नहीं की| किंतु, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इस युग को श्रृं’गारकाल’ कहना सर्वथा समीचीन है| इस नाम के पक्ष में जो यह तर्क दिया जाता है कि इस युग के कवियों की व्यापक प्रवृत्ति श्रृंगार-वर्णन की थी, उसके स्वीकार किए जाने में आपत्ति की जा सकती है| क्योंकि इसमें संदेह नहीं कि इस युग में अधिकांश रचनाएं श्रृंगारिक ही हैं, लेकिन ये भी सत्य है कि ये रचनाएं आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए लिखी गई थी। इसका प्रेरक तत्व कवियों की कामवासना नहीं ‘अर्थ’ है; जो विलासी आश्रयदाताओं से इस प्रकार के काव्य की रचना करके ही प्राप्त किया जा सकता था|”३ इसलिए इसे श्रृंगार काल कहना न्यायसंगत नही लगता। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को ‘रीतिकाल’ नाम दिया है| रीतिकाल से मिलता-जुलता रीतिकाव्य शब्द शुक्ल से पूर्व ग्रियर्सन ने भी इस काल के लिए प्रयोग किया है| उन्होंने अपने साहित्य “मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान के सातवें अध्याय में इस युग को रीति काव्य कहा है|”४ इस प्रकार सभी नामों और तर्कों पर विचार करने के उपरांत अंत में आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा दिया गया ‘रीतिकाल’ नाम ही अधिक संगत प्रतीत होता है|
अब ‘रीति’ शब्द पर भी विचार करना आवश्यक है| क्योंकि यह प्रश्न भी उठता है कि क्या रीति शब्द का कुछ संबंध संस्कृत काव्यशास्त्र के ‘रीतिसंप्रदाय’ से भी है| क्योंकि हिंदी साहित्य में प्रयोग होने से पहले इस शब्द का संस्कृत काव्यशास्त्र में भी प्रयोग हुआ है| संस्कृत काव्यशास्त्र में रस संप्रदाय, अलंकार संप्रदाय की तरह ‘रीतिसंप्रदाय’ भी है जिसमें ‘रीति’ को काव्य की आत्मा माना गया है, इस सिधांत का प्रतिपादन आचार्य वामन ने किया था| कुछ विद्वानों ने इस संबंध को स्वीकार भी किया है- “यह संस्कृत के काव्यशास्त्र का बहुत कुछ समानार्थी कहा जा सकता है, क्योंकि संस्कृत के काव्यशास्त्र की तरह इसमें भी काव्य-रचना के विविध उपकरणों की परिभाषा और व्याख्या होती है, पर संस्कृत काव्यशास्त्र की परिस्थिति और गंभीर विवेचना इसमें कहां? ”५
वास्तव में देखा जाये तो इन सब बातों से अलग रीतिकाल में ‘रीति’ शब्द एक विशेष प्रकार की परिपाटी का सूचक है| हिंदी में ‘रीति’ को काव्य रचना की एक विशिष्ट प्रणाली के रूप में ग्रहण किया गया है| तात्पर्य यह है कि रीतिकाल में कवियों ने एक विशिष्ट प्रणाली को दृष्टि में रखते हुए काव्य की रचना की| इस विशिष्ठ प्रणाली में सबसे पहले कवि आचार्य धर्म का निर्वाह करते हुए काव्य रचना की रीति या लक्षण प्रस्तुत करते थे और फिर उसके अनुरूप ही उदाहरणों की रचना करते थे| ये उदाहरण उनके स्वयं के रचित भी होते थे और कभी-कभी दूसरे कवियों द्वारा रचित उदाहरण भी दिए जाते थे| इस प्रकार इस युग में लक्षण बताकर उदाहरण देने की परंपरा सी बन गई थी और इस प्रकार की रचना-पद्धति को ‘रीति’ का नाम दिया गया| ‘रीति’ के संबंध में बच्चन सिंह अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में लिखते हैं- “काव्यरीति, रसरीति, अलंकाररीति आदि का प्रयोग इस काल के अनेक कवियों ने स्वयं किया है|”६ अंत में कहा जा सकता है कि रीतिकालीन काव्य ऐसा काव्य है जो अलंकार. रस, गुण ,ध्वनि, नायिका-भेद आदि की काव्यशास्त्रीय प्रणाली के आधार पर रचा गया हो|
जहाँ तक श्रृंगार रस की बात है, मानाकि इन कवियों में श्रृंगार की प्रवृत्ति प्रमुख रही है| लेकिन इस बात को भी भुलाया नहीं जा सकता कि इन्होंने श्रृंगार के अतिरिक्त अन्य काव्य अंगों का भी विवेचन किया है| बहुत से कवियों ने नीति और भक्ति तथा वीर भावना को आधार बनाकर काव्य रचना की है| इसके साथ-साथ इन कवियों ने संस्कृत की काव्यशास्त्रीय परंपरा का निर्वाह करते हुए अलंकार, रस, नायिका-भेद, ध्वनि आदि को भी अपने काव्य में स्थान दिया है| इसलिए माना जा सकता है कि रीतिकालीन साहित्य पर संस्कृत की काव्य शास्त्रीय परंपरा का गहरा असर है, परंतु यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी जरुरी है कि हिंदी में रीति शास्त्र लिखने वाले प्रत्येक लेखक ने संस्कृत काव्यशास्त्र का पूरा अध्ययन नहीं किया था बल्कि हिंदी में लक्षण ग्रंथों की रचना करने वाले ये विद्वान पूर्णत संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ नहीं थे, परन्तु ऐसे कवि अपने आप को आचार्य कहते थे, ऐसे आचार्यों के संबंध में रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं- “हिंदी में लक्षण ग्रंथों की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकड़ों कवि हुए हैं, आचार्य की कोटि में नहीं आ सकते, वे वास्तव में कवि ही थे, उनके अपर्याप्त लक्षण साहित्य शास्त्र का सम्यक बोध कराने में असमर्थ हैं|”७ अर्थात आचार्य शुक्ल ने ऐसे आचार्यों को मूलत; कवि ही माना है|
रीतिकालीन साहित्य का वर्गीकरण तीन काव्य धाराओं में किया जाता है- रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त| रीतिबद्ध काव्यधारा में केशव, मतिराम और पद्माकर आदि आते हैं| रीतिसिद्ध काव्यधारा में बिहारी का नाम लिया जाता है और रीतिमुक्त काव्य में घनानंद, बोधा, आलम और ठाकुर आदि लेखकों का नाम आता है|
रीतिबद्ध काव्य धारा में उन कवियों को गिना जाता है जिन्होंने लक्षण ग्रंथों की परिपाटी पर काव्यांगों का लक्षण व उदाहरण देते हुए रीति ग्रंथों की रचना की है| इन कवियों का मुख्य उद्देश्य अपने काव्य शास्त्रीय ज्ञान का परिचय देना था| इस काव्यधारा में ऐसा भी वर्ग था जिनका लक्षणों व उदाहरणों पर समान रूप से अधिकार था| इन्होंने लक्षणों की स्वयं व्याख्या की और उदाहरण भी स्वयं ही रचे| कुछ आचार्यों ने जैसे कि कुलपति, देव आदि ने काव्य के सभी अंगों, काव्य-लक्षण, काव्य-हेतु, काव्य-प्रयोजन, काव्य की आत्मा आदि का विवेचन अपने ग्रंथों में किया है| ऐसे आचार्य को सर्वांग निरूपक आचार्य कहा गया है| कुछ आचार्यों ने काव्य के विशिष्ट अंगों पर अपना काव्य लिखा है इन्हें विशेषटांग आचार्य कहा गया है| जैसे मतिराम, भूषण आदि |
रीतिसिद्ध कवि उन कवियों को कहा गया है जिन्होंने किसी भी लक्षण ग्रंथ की रचना तो नहीं कि यद्यपि उन्हें लक्षणों की पूरी जानकारी थी। जिसका उपयोग उन्होंने अपने काव्य ग्रंथों की रचना करते समय किया है। इस धारा के कवियों ने काव्यशास्त्र के सिद्धांत एवं लक्षण प्रस्तुत नहीं किए हैं। परंतु जो काव्य लिखा है वह पूर्णतया काव्यशास्त्र परिपाटी से मुक्त नहीं है। बिहारी इसी काव्य धारा के अंतर्गत आते हैं जिन्होंने किसी भी प्रकार के लक्षण ग्रंथों की रचना नहीं की परंतु फिर भी रीति परिपाटी की सभी रचनाएं उनकी बिहारी सतसई में मिलती है। रीति सिद्ध काव्य में केवल यही अंतर है कि जहां वे किसी विशिष्ट लक्षण से जुड़े हुए हैं, वहां यह काव्य शास्त्रीय नियमों का पालन करते हुए भी मुक्त है।
रीति मुक्त काव्य धारा में उन कवियों को शामिल किया गया है जिन्होंने रीति से मुक्त होकर स्वच्छंद रूप से काव्य सृजन किया है।इस काव्य धारा को स्वच्छंद काव्यधारा भी कहा गया है। रीतिमुक्त कवियों के लिए काव्य साधन नहीं था। इन्होंने कविता प्रयत्न करके नहीं लिखी बल्कि यह उनके हृदय से स्वत: ही फूट पड़ी है। रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रमुख कवि घनानंद, ठाकुर, बोधा और आलम हैं |
रीति मुक्त काव्य धारा में उन कवियों को शामिल किया गया है जिन्होंने रीति से मुक्त होकर स्वच्छंद रूप से काव्य सृजन किया है।इस काव्य धारा को स्वच्छंद काव्यधारा भी कहा गया है। रीतिमुक्त कवियों के लिए काव्य साधन नहीं था। इन्होंने कविता प्रयत्न करके नहीं लिखी बल्कि यह उनके हृदय से स्वत: ही फूट पड़ी है। रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रमुख कवि घनानंद, ठाकुर, बोधा और आलम हैं |
यह युग मुक्तक रचना का युग था| कवित्त, सवैया और दोहे इस युग में खूब लिखे गए। कवि राजाश्रित होते थे। इसलिए इस युग की कविता अधिकतर दरबारी रही। जिसके फलस्वरूप इसमें व्यंजना का चमत्कार विशेष मात्रा तो मिलती है परंतु कविता साधारण जनता से विमुख भी हो गई।
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