प्रयोगवाद या नई कविता
छायावाद के उपरांत ऐसे नवयुवक कवि काव्य जगत में आए जिन्होंने अपनी कविता के माध्यम से हिंदी कविता को नया मोड़ दिया, इस कविता को साहित्य में प्रयोगवादी कविता कहा गया। प्रयोगवादी कविता से पहले दो प्रमुख काव्य आंदोलन आए- एक छायावाद और दूसरा प्रगतिवाद। छायावादी कविता का आरम्भ १९३८ से माना जाता है| हिंदी साहित्य में यह बहुत महत्त्वपूर्ण काल माना जाता है परन्तु अंत तक आते आते लाक्षणिकता, कल्पनाशीलता और पलायनवादी होने का आरोप लगाया जाने लगा | फलत: प्रगतिवादी कविता का जन्म हुआ| इस काव्यधारा ने 1936 से 1943 तक जीवन जिया|
प्रगतिशील काव्य के उपरांत, 1943 में 'तार सप्तक' नामक संग्रह के प्रकाशन के साथ ही जो काव्य आंदोलन आया, उसको प्रयोगवाद का नाम दिया गया। इससे पहले की हिंदी कविता अर्थात सारी की सारी कविता स्वाधीनता से पहले की कविता है और प्रयोगवादी कविता स्वाधीनता के बाद की पहली कविता है। पहले की कविता में भाव बोध की प्रधानता थी और उसमें समाजिकता का आग्रह ज्यादा था। इस कविता में सम्प्रेषण पर भी ज्यादा ध्यान दिया गया, लेकिन तार सप्तक के बाद की अर्थात प्रयोगवादी और नई कविता में व्यैक्तिकता पर तथा रूप और शिल्प के स्तर पर नए प्रयोग पर ज्यादा ध्यान दिया गया। जो सामाजिक, राजनैतिक बिंदु या चिंताएं छयावाद के पास थी ,वे बिंदु या चिंताएं प्रयोगवादी कविता के पास नहीं हैं इसके साथ ही यह कविता ज्यादा बौद्धिकता प्रधान हो गई। जब कविता व्यैक्तिकता प्रधान और बौद्धिकता प्रधान होगी और जिसमें प्रयोग की चिंता रहेगी तो स्वाभाविक है कि वो कविता दुरुह भी होगी इसलिए दुरूहता भी इस कविता की एक विशेषता है। देखा जाए तो प्रयोगवाद और नई कविता को समझने के लिए तीनों तार सप्तकों का समझना जरूरी है।
पहला तार सप्तक जो 1943 में निकला, जिससे प्रयोगवाद का आरम्भ माना जाता है, उसके कवि हैं- गजानन माधव मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर, नेमीचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा, अज्ञेय | इस संग्रह की भूमिका में सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय ने प्रयोग पर ज्यादा बल दिया है, जिस वजह से इस संग्रह की कविता के आधार पर नहीं इसकी भूमिका के आधार पर लोगों ने इस कविता को प्रयोगवादी कविता कहना शुरू कर दिया। 1943 में प्रकाशित इस तार सप्तक में नए तत्व और यथार्थ के धरातल की अभिव्यक्ति देने के लिए नए प्रयोगों को स्पष्ट किया |
सन् 1951 में दूसरा 'तार सप्तक' प्रकाशित हुआ। 1951 में जब हमारे सामने दूसरा तार सप्तक आया तो प्रयोगवाद के स्थान पर नई कविता शब्द का स्थापन हो चुका था| इसके कवि हैं- भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंतला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती|इस तार सप्तक की भूमिका अज्ञेय ने लिखी थी और उन्होंने नई कविता शब्द का प्रयोग किया था, लेकिन उससेे पहले शमशेर बहादुर सिंह ने अपने व्यक्तव्य में नई कविता शब्द का प्रयोग किया था और अज्ञेय ने भूमिका शमशेर बहादुर सिंह के व्यक्तव्य के बाद लिखी थी अतः सबसे पहले नई कविता शब्द का प्रयोग शमशेेेर बहादुर सिंह ने किया। इसके अलावा अज्ञेय ने इस भूमिका में प्रयोगवाद के नाम पर विरोध भी प्रकट किया। उन्होंने कहा कि "प्रयोग का कोई विवाद नहीं है। हम वादी नहीं रहे, नहीं है, नए प्रयोग अपने आप में इष्ट का साध्य है ठीक इसी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं। अतः हमें प्रयोगवादी कहना उतना ही सार्थक या निरर्थक है जितना इसे कविता वादी कहना।" इसके अलावा अज्ञेय इस पूरे वाद के संचालक थे और उन्होंने 19 52 में अपनी वार्ता में (पटना ) नई कविता की विस्तार से व्याख्या की है, उन्होंने उसकी विशेषताओं का भी उल्लेख किया है अत: ध्यान रखने की बात यह है कि नई कविता का जन्म दूसरे तारसप्तक के प्रकाशन के साथ हुआ।
तीसरा तारसप्तक 1959 में निकला, उसके कवि हैं- कुंवर नारायण, कीर्ति चौधरी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्सायन, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, विजयदेव नारायण साही | तीसरे तारसप्तक के साथ ही नई कविता का अंत माना जा सकता है। इसका मतलब ये हुआ कि जहाँ दूसरा सप्तक नई कविता का आरंभिक संग्रह माना जा सकता है तो तीसरा सप्तक नई कविता आंदोलन का आखिरी संग्रह माना जा सकता है। नई कविता केे एक रघुवीर सहाय और दूसरे शमशेर बहादुर सिंह बहुत महत्वपूर्ण कवि हैैं।
हिंदी के आधुनिक साहित्य पर पश्चिम के साहित्य का गहरा प्रभाव है| स्वछंदतावाद की धारा पर अंग्रेजी के रोमांटिसिज्म का प्रभाव है और छायावाद को भी उससे जोड़ कर देखा जाता है| प्रगतिवाद को भी प्रोग्रेसिवसिज़्म के प्रभाव का परिणाम माना गया है। इसी प्रकार प्रयोगवाद का केंदीय तत्व प्रयोग भी अंग्रेगी के एक्स्प्रिमेंट का अनुवाद है। और प्रयोगवाद एक्सप्रैमेंटिसिज्म का अनुवाद है| इन सप्तकों में से बहुत सारे कवि प्रयोगवाद से चलकर आगे नई कविता से भी जुड़ गए जैसे स्वयं अज्ञेय या मुक्तिबोध आदि। यही कारण है कि प्रयोगवाद की विशेषताओं को नई कविता में भी देखा जा सकता है। पहले की कविता की तरह ही नई कविता भी अंग्रेजी प्रभाव से कैसे बच नहीं सकती थी इसलिए माना जाता है कि नई कविता के समय भी अंगेजी में new poem और new year (वर्ष) नाम से कविताएँ छपी थी और नई कविता शब्द भी उसी के प्रभाव का परिणाम माना जा सकता है | अत: 1960 के बाद नई कविता समाप्त होती दिखाई देती है।
बिहार के तीन प्रसिद्ध कवियों - नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार व नरेश मेहता ने इस युग को नकेल वाद या प्रपद्यवाद नाम दिया| इस प्रकार प्रगतिवाद की परवर्ती काव्यधारा को अनेक नामों से जाना जाता है| जैसे - प्रयोगवाद, प्रतीकवाद प्रपद्यवाद नकेनवाद ,नई कविता आदि| प्रयोगवाद शब्द का आज भी प्रयोग करते हैं| इसी तरह नई कविता शब्द भी सर्वाधिक प्रचलित है|
कुछ विद्वान प्रयोगवाद तथा नई कविता को भिन्न भिन्न मानते हैं किंतु वास्तविकता यह नहीं है यह दोनों एक ही कविता धारा के विकास की अवस्थाएं हैं, प्रयोगवाद नई कविता की आरंभिक अवस्था है और नई कविता उसकी विकसित अवस्था है| प्रयोगवादी कवि ही नई कविता के निर्माता हैं| नई कविता आधुनिक हिंदी काव्य की प्रवाहमान धारा है|
इन तारसप्तक कविता संग्रहों के अतिरिक्त अनेक पत्रिकाएं भी निकली, जिनमें नई कविता परिलक्षित होती है इनमें पाटल, दृष्टिकोण, कल्पना, अजंता, राष्ट्रवाणी, धर्मयुग आदि| 1954 में नई कविता शीर्षक नामक पत्रिका डॉक्टर जगदीश गुप्त के संपादन में निकली| यह वार्षिक पत्रिका है | निकष भी नई कविता की प्रमुख पत्रिका है| अज्ञेय जी के अनेक कविता संकलन भी प्रकाश में आए जैसे- हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, में भी नई कविताओं की विशेषताएं लक्षित होती हैं| गिरिजाकुमार माथुर की मंजीर, नाश और निर्माण, भारत भूषण अग्रवाल की ओ प्रस्तुत मन, देवराज की धरती और स्वर्ग भी नई कविता के अंतर्गत शामिल की जा सकती है|
इसके अतिरिक्त केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, कीर्ति चौधरी, अजीत कुमार, दुष्यंत कुमार, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि कवियों की कविताएं भी इसी कोटि के अंतर्गत आती हैं | विजयदेव नारायण साही की भी कविताएं इसी के अंतर्गत आती हैं|
यदि इन कवियों की रचनाओं पर दृष्टिपात करें तो निम्नलिखित विशेषताएं लक्षित होती है
निराशा की भावना
नई कविता में सामान्य रूप से निराशा की भावना सर्वत्र व्याप्त है और अविश्वास, असहायता, अकेलापन आदि के कारण जो मानवीय मूल्यों में विघटन हुआ, कवि के मन पर इसका प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। नई कवियों के सामने सामाजिक विषमताएँ मुंह बाए खड़ी है और कवि को इनसे संघर्ष करना पड़ता है। समाज में सभ्य असभ्य, नागरिक ग्रामीण, ईमानदारी बेईमानी, धोखाधड़ी आदि के प्रत्यक्ष दर्शन कवि को होते हैं। विजयदेव नारायण साही की कविता-
'हम सभी बेच कर आए हैं अपने सपने' में निराशा की अभिव्यक्ति हुई है। में निराशा की अभिव्यक्ति हुई है
आस्था और विश्वास
नई कविता में जहां एक और निराशा है वहाँ दूसरी ओर आस्था और विश्वास भी व्यक्त हुआ है। दुष्यंत कुमार की 'अभी तो' शीर्षक कविता में भविष्य की आभा अत्यंत सुंदर है भविष्य की आशा अत्यंत सुंदर है-
रात के घने काले समय में,
मेरी हथेली पर,
तुमने बनाया है जो सूरज,
मेहंदी से,
कहीं सुबह तक रचेगा
लाल होगा
यू उतावले मत हो
रचेगा जरूर
सूरज है
तुमने बनाया है
लेकिन प्रिय अभी अंधेरा है।
नमी है हथेली में सुबह की प्रतीक्षा है।
कीर्ति चौधरी की कविताओं में भविष्य के लिए अपार विश्वास झलकता है। 'प्रतीक्षा' नामक कविता में कीर्ति चौधरी लिखती है-
"आखिर तो
.........
आएगा भविष्य कभी
करूंगी प्रतिक्षा अभी।
नए कवियों में अज्ञेय मुख्य रूप से आस्थावादी कवि हैं। वे मानते हैं- नकारों में जीवन नहीं चलता'
ईश्वर के प्रति अनास्था-
बौद्धिक युग की पुत्री होने के कारण नई कविता का भावनात्मक दृष्टिकोण के साथ जन्मजात विरोध है। नई कविता में ईश्वर, नियति, मंदिर, देवी- देवता आदि में कोई आस्था नहीं है। नए कवि को यदि कहीं नर या भगवान के दर्शन होते हैं तो वे केवल अपनी प्रिया में।
क्षण का महत्व
नई कविता में क्षण को अत्यंत महत्व देते हैं। नए कवि क्षण की उपेक्षा नहीं करते। शरीर में जिस प्रकार अंगों को नगण्य नहीं समझा जा सकता वैसे ही काल-शरीर में क्षण-अंगों को महत्वहीन नहीं माना जा सकता। अज्ञेय ने क्षण के महत्व को प्रमुख मानते हुए लिखा है-
एक क्षण
क्षण प्रवहमान
व्याप्त संपूर्णता ।
अज्ञेय ने क्षण में ही संपूर्णत्व, स्थायित्व, अस्तित्व, सत्य के साक्षात दर्शन किए हैं। गजानन मुक्तिबोध ने मृत्यु और कवि शीर्षक रचना में लिखा है-
क्षणभंगुरता के इस क्षण में,
जीवन की गति जीवन का स्वर
दो सौ वर्ष आयु यदि होती तो क्या
अधिक सुखी होता नर।
भोगवाद या वासना की प्रवृत्ति
सुखवाद से प्रभावित नए कवियों ने लोक मर्यादा की ओर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। संयोग श्रृंगार का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करने में नए कवि हिचके नहीं। वासना, मांसलता, इन्द्रीयता इन कवियों में पाई जाती है। पाश्चात्य सिद्धांत eat, drink and be marry को इन कवियों ने पूरी तरह से अपनाया है। शकुंतला माथुर की इन पंक्तियों में संयोग श्रृंगार का उदाहरण है-
चली आई बेला
सुहागिन पायल पहने
बाण बिध हिरनी सी
बाहों में सिमट जाने को
उलझने को लिपट जाने को
मोती की लड़ी समान।
धर्मवीर भारती की कविता में वासना का खुला चित्र है-
जिस दिन से तुमने फूल बिखेरे माथे पर
अपने तुलसी दल जैसे पावन ओंठों से
मैं महज तुम्हारे गर्म वक्ष में
शीश छिपा चिड़ियों के सहमें बच्चे सा
हो गया मूक।
इन उद्धरणों में सुखवाद मांसलता के साथ ही आध्यात्मिकता को भी भौतिकता के धरातल पर खींच लाया है।
वेदना की प्रमुखता
नई कविता में वेदना व्यापक रूप से छाई हुई है। नरेश मेहता की प्रार्थना कविता में वेदना का सुंदर चित्रण हुआ है।
वहन करो ओ मन
ओ मन वन करो पीड़ा।
भारत भूषण अग्रवाल ने भी वेदना के अंदर भविष्य के नए प्रकाश को देखने का प्रयास किया है।
व्यंग्य की प्रधानता
नई कविता में व्यंग्य की प्रधानता सर्वत्र दिखाई देती है। मानव जीवन की विभीषिकाओं, विकटताओं, असफलताओं व अभावों के कारण ये कवि सभ्यता पर व्यंग्य करते हैं-
सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं
न होंगे,
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूं
उत्तर दोगे
फिर कैसे सीखा डसना, विष कहां से पाया।
कुंवर नारायण की कविता 'बहार आई है, में भी शहरी सभ्यता पर प्रकाश डाला गया है।
यह जंगली फूल जो हर साल
हल्ला बोल कर जो शहर में घुस आते हैं
और राह चलते, आते जाते लोगों को
बेशर्मी से घूरते फुसलाते हैं
पर क्या मालूम नहीं
कि शहरों में इनकी सख्त मनाही है।
कि कोई किसी से बिना जान-पहचान बोले
कि देखो बाहर आई है।
विगत दो महायुद्धों का अभिशाप इस देश में भोगा व सहा है।इसके परिणामों से आज का कवि युद्ध का विद्रोह करता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कलाकार और सिपाही आदि कविताएं युद्ध के प्रति व्यंग्यात्मक रचनाएं हैं। भवानी प्रसाद मिश्र का गीत फरोश कवि की विवशता का जीवित चित्र है। नई कविता में व्यंग्य एक बहुत बड़ी शक्ति के रूप में देखा जा सकता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पंक्तियां हैं-
लेकिन मैं देखता हूं कि आज के जमाने में
आदमी से ज्यादा लोग पोस्टरों को पहचानते हैं,
वे आदमी से बड़े सत्य हैं।
भदेश चित्रण
नई कविता में भदेश का चित्रण एक अपनी विशेषता है। नए कवियों ने इन सभी विषयों को स्थान दिया जो अब तक उपेक्षित थे । काव्य में सौंदर्य बोध की परिणति हमारे आनंद बोध में होती है इसलिए करुण, भयानक, रौद्र, विभक्त रसों के साधारणीकरण से हम दुख, डर, विनाश या घृणा की प्राप्ति न कर आनंद के बीच अपनी आत्मा की अवस्थिति पाते हैं।
नई कविता में विरूपता अश्लीलता जैसी कोई चीज ही नहीं मानी गई है। असुंदर का भी सौंदर्य पक्ष में महत्व है ।इसलिए नई कविता ने भदेश, असुंदर और अरूप के प्रति एक प्रकार का आग्रह देखने को मिलता है। नागार्जुन की पंक्तियों में भदेश का बोध होता है-
सरग था ऊपर
नीचे पाताल था
अपच के मारे बहुत बुरा हाल था ।
दिल दिमाग.........।
इस प्रकार की कविताओं में भदेस का चित्रण है
शैली पक्ष
कला पक्ष के क्षेत्र में इस युग में सबसे अधिक प्रयोग हुए हैं ।इनका पहला नारा है भाषा का सर्वथा वैयक्तिक प्रयोग। इसलिए इन्होंने शब्दों में एक नया सारगर्भित अर्थ भरने का प्रयत्न किया है। इसी प्रयत्न में कभी-कभी शब्दों का अनर्गल प्रयोग भी हो गया है।
नई कविता में यौन वर्जनाओं की अभिव्यक्ति प्रतीकों के माध्यम से हुई है। कहीं-कहीं मानसिक उलझनों को अभिव्यक्त करने के लिए भी प्रतीकों का प्रयोग किया है। अतः कुछ इसे प्रतीकवाद भी कहते हैं । इन कवियों ने प्राचीन प्रतीकों के स्थान पर नए प्रतीक लिए हैं । जैसे प्रकाश के लिए दीप मशाल आदि के स्थान पर टॉर्च शब्द का प्रयोग किया है।
सघन जीवन निशा
विद्युत लिए मानो अंधेरे में
बटोही जा रहा हो टॉर्च ले
इसी प्रकार नई कविता में सुंदर बिंबों का प्रयोग हुआ है ।
वर्षा की पहली बूंद को देखकर कवि एक सुंदर बिंब की सृष्टि करता है
बूंद टपकी एक नभ से
किसी ने झुककर झरोखे से
कि जैसे हंस दिया हो
हंस रही थी आँख ने जैसे किसी को
कस दिया हो
इन कवियों ने प्राचीन काल के रूढ़ उपमानों का बहिष्कार करके इनके प्रति विद्रोह प्रकट किया है।
जैसे
चांदनी सदृश चंदन हम क्यों लिखें
मुख कमलों सरीखे क्यों दिखे
हम लिखेंगे चांदनी उस रुपए सी है
जिसमें चमक है पर खनक गायब है
कहीं-कहीं नूतनता का मोह हास्यास्पद बन गया है जैसे
मेरे सपने इस तरह टूट गए
जैसे भुना हुआ पापड़
कहीं-कहीं ध्वन्यात्मकता अथवा ध्वनि चित्र भी सुंदर बन पड़े हैं जैसे
नींद भरे आलिंगन में चूड़ी की फिसलन
आज का कवि मुक्त छंद में विश्वास रखता है। शिवमंगल सिंह सुमन के शब्दों में "भावनाओं की व्यापकता को संवारने के लिए मुक्त छंद बड़ा ही उपयुक्त प्रतीत होता है और युग की चेतना स्वाभाविक रूप से उसकी ओर उन्मुख हो उठी। इन्हीं विचारों के कारण आलोचकों ने इस कविता को काव्य न मानकर गद्य माना है। परंतु कविता का अनिवार्य तत्व भावाभिव्यक्ति जो इन कविताओं में शुद्ध रूप में मिलती है और अतुकांत होते हुए भी यह कविताएं भावों की एक विशेष प्रकार की लय लिए हुए हैं।
नई कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वादात्मक धरातल से मुक्त है। दिनकर के शब्दों में यह शुद्ध साहित्यिक आंदोलन है , कला का आंदोलन है , उसका मुख्य ध्येय हमारी धारणाओं को परिवर्तित करना है।
इस प्रकार नई कविता में वादों की उन्मुक्तता बढ़ती आ रही है । नई कविता की किसी वाद के प्रति रुचि न होने के कारण स्वतंत्र पथ पर अग्रसर होती हुई प्रतीत होती है। इसका सबसे बड़ा योगदान मतवादी धरातल का परित्याग कहा जा सकता है।
नई कविता के संबंध में अज्ञेय के शब्दों में कहा जा सकता है-
फिर भी तुम मरे नहीं तुमसे तुम्हारी
संभावनाएं बढ़ी है।
संघर्षों में बढ़ती हुई नई कविता के प्रति अज्ञेय की यह आस्था अपने आप में नई उपलब्धि है।
आज का कवि स्वतंत्रता, समानता, क्रांति, स्वच्छंदता में विश्वास रखता है। हिंदी साहित्य की आधुनिक कविता के विकास को तीन उत्थानों में बांटा जा सकता है। प्रथम उत्थान की विशेषता भाव परिवर्तन द्वितीय उत्थान की विशेषता भाषा परिवर्तन और तीसरा उत्थान अभिव्यंजना की नवीन प्रणाली है। मानसिक संकीर्णता और विद्वेष को छोड़कर यदि आधुनिक काव्य को पढ़ा जाए तो जीवन के विस्तृत क्षेत्र मिलने के साथ सर्वत्र महान संदेश भी सुनाई देगा।
प्रयोगवाद की भूमिका
प्रगतिवादी काव्यधारा 1936 से 1943 के अंत समय तक ही जीवित रह सकी और उसके पश्चात प्रयोगवाद का जन्म हुआ। प्रगतिवाद के अंत के कई कारण थे- दिनकर के अनुसार "प्रगतिवाद ने साहित्य पर ऐसा कोई भी प्रभाव नहीं डाला जिसे हम किसी भी दृष्टि से साहित्यिक प्रभाव कह सके। यह मुख्यतः असाहित्यिक आंदोलन था जो साहित्य के भीतर केवल राजनीतिक उपयोग के लिए साहित्यकारों का शोषण करने आया था। इसलिए उसे मार्क्सवादी साहित्यिक संस्करण कहा गया। विषय वस्तु भी विषय वस्तु की संकीर्णता .....रूबी के प्रति असंतोष ही प्रगतिवाद के ह्रास का कारण ही नहीं अपितु शिल्प सौंदर्य के प्रति उदासीनता भी कारण था। प्रगतिवाद में कला पक्ष में प्रगति के स्थान पर गति उत्पन्न की।... द्वितीय महायुद्ध के परिणाम स्वरुप में छिपी अनेक भावनाएं वे चिंताएं छिपकर आ रही थी जीवन अपने शहर सरलता खो रहा था।...... युद्ध के कारण मानव मूल्यों में अस्थिरता गई थी। शाश्वत और चिरंतन मूल्यों पर एक प्रश्न चिन्ह लग गया था। पुरानी आस्थाएं टूट गई पर नई स्थान नहीं ले पा रही थी। इसी प्रकार मानव मूल्यों में अराजकता, अस्थिरता, बिखराव पनप रहा था। उसमें भाव बोध को व्यक्त करने के लिए नई तकनीक की आवश्यकता महसूस हुई और परिणाम स्वरुप प्रयोगवाद का जन्म हुआ।
छायावाद के उपरांत ऐसे नवयुवक कवि काव्य जगत में आए जिन्होंने अपनी कविता के माध्यम से हिंदी कविता को नया मोड़ दिया, इस कविता को साहित्य में प्रयोगवादी कविता कहा गया। प्रयोगवादी कविता से पहले दो प्रमुख काव्य आंदोलन आए- एक छायावाद और दूसरा प्रगतिवाद। छायावादी कविता का आरम्भ १९३८ से माना जाता है| हिंदी साहित्य में यह बहुत महत्त्वपूर्ण काल माना जाता है परन्तु अंत तक आते आते लाक्षणिकता, कल्पनाशीलता और पलायनवादी होने का आरोप लगाया जाने लगा | फलत: प्रगतिवादी कविता का जन्म हुआ| इस काव्यधारा ने 1936 से 1943 तक जीवन जिया|
प्रगतिशील काव्य के उपरांत, 1943 में 'तार सप्तक' नामक संग्रह के प्रकाशन के साथ ही जो काव्य आंदोलन आया, उसको प्रयोगवाद का नाम दिया गया। इससे पहले की हिंदी कविता अर्थात सारी की सारी कविता स्वाधीनता से पहले की कविता है और प्रयोगवादी कविता स्वाधीनता के बाद की पहली कविता है। पहले की कविता में भाव बोध की प्रधानता थी और उसमें समाजिकता का आग्रह ज्यादा था। इस कविता में सम्प्रेषण पर भी ज्यादा ध्यान दिया गया, लेकिन तार सप्तक के बाद की अर्थात प्रयोगवादी और नई कविता में व्यैक्तिकता पर तथा रूप और शिल्प के स्तर पर नए प्रयोग पर ज्यादा ध्यान दिया गया। जो सामाजिक, राजनैतिक बिंदु या चिंताएं छयावाद के पास थी ,वे बिंदु या चिंताएं प्रयोगवादी कविता के पास नहीं हैं इसके साथ ही यह कविता ज्यादा बौद्धिकता प्रधान हो गई। जब कविता व्यैक्तिकता प्रधान और बौद्धिकता प्रधान होगी और जिसमें प्रयोग की चिंता रहेगी तो स्वाभाविक है कि वो कविता दुरुह भी होगी इसलिए दुरूहता भी इस कविता की एक विशेषता है। देखा जाए तो प्रयोगवाद और नई कविता को समझने के लिए तीनों तार सप्तकों का समझना जरूरी है।
पहला तार सप्तक जो 1943 में निकला, जिससे प्रयोगवाद का आरम्भ माना जाता है, उसके कवि हैं- गजानन माधव मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर, नेमीचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा, अज्ञेय | इस संग्रह की भूमिका में सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय ने प्रयोग पर ज्यादा बल दिया है, जिस वजह से इस संग्रह की कविता के आधार पर नहीं इसकी भूमिका के आधार पर लोगों ने इस कविता को प्रयोगवादी कविता कहना शुरू कर दिया। 1943 में प्रकाशित इस तार सप्तक में नए तत्व और यथार्थ के धरातल की अभिव्यक्ति देने के लिए नए प्रयोगों को स्पष्ट किया |
सन् 1951 में दूसरा 'तार सप्तक' प्रकाशित हुआ। 1951 में जब हमारे सामने दूसरा तार सप्तक आया तो प्रयोगवाद के स्थान पर नई कविता शब्द का स्थापन हो चुका था| इसके कवि हैं- भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंतला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती|इस तार सप्तक की भूमिका अज्ञेय ने लिखी थी और उन्होंने नई कविता शब्द का प्रयोग किया था, लेकिन उससेे पहले शमशेर बहादुर सिंह ने अपने व्यक्तव्य में नई कविता शब्द का प्रयोग किया था और अज्ञेय ने भूमिका शमशेर बहादुर सिंह के व्यक्तव्य के बाद लिखी थी अतः सबसे पहले नई कविता शब्द का प्रयोग शमशेेेर बहादुर सिंह ने किया। इसके अलावा अज्ञेय ने इस भूमिका में प्रयोगवाद के नाम पर विरोध भी प्रकट किया। उन्होंने कहा कि "प्रयोग का कोई विवाद नहीं है। हम वादी नहीं रहे, नहीं है, नए प्रयोग अपने आप में इष्ट का साध्य है ठीक इसी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं। अतः हमें प्रयोगवादी कहना उतना ही सार्थक या निरर्थक है जितना इसे कविता वादी कहना।" इसके अलावा अज्ञेय इस पूरे वाद के संचालक थे और उन्होंने 19 52 में अपनी वार्ता में (पटना ) नई कविता की विस्तार से व्याख्या की है, उन्होंने उसकी विशेषताओं का भी उल्लेख किया है अत: ध्यान रखने की बात यह है कि नई कविता का जन्म दूसरे तारसप्तक के प्रकाशन के साथ हुआ।
तीसरा तारसप्तक 1959 में निकला, उसके कवि हैं- कुंवर नारायण, कीर्ति चौधरी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्सायन, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, विजयदेव नारायण साही | तीसरे तारसप्तक के साथ ही नई कविता का अंत माना जा सकता है। इसका मतलब ये हुआ कि जहाँ दूसरा सप्तक नई कविता का आरंभिक संग्रह माना जा सकता है तो तीसरा सप्तक नई कविता आंदोलन का आखिरी संग्रह माना जा सकता है। नई कविता केे एक रघुवीर सहाय और दूसरे शमशेर बहादुर सिंह बहुत महत्वपूर्ण कवि हैैं।
हिंदी के आधुनिक साहित्य पर पश्चिम के साहित्य का गहरा प्रभाव है| स्वछंदतावाद की धारा पर अंग्रेजी के रोमांटिसिज्म का प्रभाव है और छायावाद को भी उससे जोड़ कर देखा जाता है| प्रगतिवाद को भी प्रोग्रेसिवसिज़्म के प्रभाव का परिणाम माना गया है। इसी प्रकार प्रयोगवाद का केंदीय तत्व प्रयोग भी अंग्रेगी के एक्स्प्रिमेंट का अनुवाद है। और प्रयोगवाद एक्सप्रैमेंटिसिज्म का अनुवाद है| इन सप्तकों में से बहुत सारे कवि प्रयोगवाद से चलकर आगे नई कविता से भी जुड़ गए जैसे स्वयं अज्ञेय या मुक्तिबोध आदि। यही कारण है कि प्रयोगवाद की विशेषताओं को नई कविता में भी देखा जा सकता है। पहले की कविता की तरह ही नई कविता भी अंग्रेजी प्रभाव से कैसे बच नहीं सकती थी इसलिए माना जाता है कि नई कविता के समय भी अंगेजी में new poem और new year (वर्ष) नाम से कविताएँ छपी थी और नई कविता शब्द भी उसी के प्रभाव का परिणाम माना जा सकता है | अत: 1960 के बाद नई कविता समाप्त होती दिखाई देती है।
बिहार के तीन प्रसिद्ध कवियों - नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार व नरेश मेहता ने इस युग को नकेल वाद या प्रपद्यवाद नाम दिया| इस प्रकार प्रगतिवाद की परवर्ती काव्यधारा को अनेक नामों से जाना जाता है| जैसे - प्रयोगवाद, प्रतीकवाद प्रपद्यवाद नकेनवाद ,नई कविता आदि| प्रयोगवाद शब्द का आज भी प्रयोग करते हैं| इसी तरह नई कविता शब्द भी सर्वाधिक प्रचलित है|
कुछ विद्वान प्रयोगवाद तथा नई कविता को भिन्न भिन्न मानते हैं किंतु वास्तविकता यह नहीं है यह दोनों एक ही कविता धारा के विकास की अवस्थाएं हैं, प्रयोगवाद नई कविता की आरंभिक अवस्था है और नई कविता उसकी विकसित अवस्था है| प्रयोगवादी कवि ही नई कविता के निर्माता हैं| नई कविता आधुनिक हिंदी काव्य की प्रवाहमान धारा है|
इन तारसप्तक कविता संग्रहों के अतिरिक्त अनेक पत्रिकाएं भी निकली, जिनमें नई कविता परिलक्षित होती है इनमें पाटल, दृष्टिकोण, कल्पना, अजंता, राष्ट्रवाणी, धर्मयुग आदि| 1954 में नई कविता शीर्षक नामक पत्रिका डॉक्टर जगदीश गुप्त के संपादन में निकली| यह वार्षिक पत्रिका है | निकष भी नई कविता की प्रमुख पत्रिका है| अज्ञेय जी के अनेक कविता संकलन भी प्रकाश में आए जैसे- हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, में भी नई कविताओं की विशेषताएं लक्षित होती हैं| गिरिजाकुमार माथुर की मंजीर, नाश और निर्माण, भारत भूषण अग्रवाल की ओ प्रस्तुत मन, देवराज की धरती और स्वर्ग भी नई कविता के अंतर्गत शामिल की जा सकती है|
इसके अतिरिक्त केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, कीर्ति चौधरी, अजीत कुमार, दुष्यंत कुमार, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि कवियों की कविताएं भी इसी कोटि के अंतर्गत आती हैं | विजयदेव नारायण साही की भी कविताएं इसी के अंतर्गत आती हैं|
यदि इन कवियों की रचनाओं पर दृष्टिपात करें तो निम्नलिखित विशेषताएं लक्षित होती है
निराशा की भावना
नई कविता में सामान्य रूप से निराशा की भावना सर्वत्र व्याप्त है और अविश्वास, असहायता, अकेलापन आदि के कारण जो मानवीय मूल्यों में विघटन हुआ, कवि के मन पर इसका प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। नई कवियों के सामने सामाजिक विषमताएँ मुंह बाए खड़ी है और कवि को इनसे संघर्ष करना पड़ता है। समाज में सभ्य असभ्य, नागरिक ग्रामीण, ईमानदारी बेईमानी, धोखाधड़ी आदि के प्रत्यक्ष दर्शन कवि को होते हैं। विजयदेव नारायण साही की कविता-
'हम सभी बेच कर आए हैं अपने सपने' में निराशा की अभिव्यक्ति हुई है। में निराशा की अभिव्यक्ति हुई है
आस्था और विश्वास
नई कविता में जहां एक और निराशा है वहाँ दूसरी ओर आस्था और विश्वास भी व्यक्त हुआ है। दुष्यंत कुमार की 'अभी तो' शीर्षक कविता में भविष्य की आभा अत्यंत सुंदर है भविष्य की आशा अत्यंत सुंदर है-
रात के घने काले समय में,
मेरी हथेली पर,
तुमने बनाया है जो सूरज,
मेहंदी से,
कहीं सुबह तक रचेगा
लाल होगा
यू उतावले मत हो
रचेगा जरूर
सूरज है
तुमने बनाया है
लेकिन प्रिय अभी अंधेरा है।
नमी है हथेली में सुबह की प्रतीक्षा है।
कीर्ति चौधरी की कविताओं में भविष्य के लिए अपार विश्वास झलकता है। 'प्रतीक्षा' नामक कविता में कीर्ति चौधरी लिखती है-
"आखिर तो
.........
आएगा भविष्य कभी
करूंगी प्रतिक्षा अभी।
नए कवियों में अज्ञेय मुख्य रूप से आस्थावादी कवि हैं। वे मानते हैं- नकारों में जीवन नहीं चलता'
ईश्वर के प्रति अनास्था-
बौद्धिक युग की पुत्री होने के कारण नई कविता का भावनात्मक दृष्टिकोण के साथ जन्मजात विरोध है। नई कविता में ईश्वर, नियति, मंदिर, देवी- देवता आदि में कोई आस्था नहीं है। नए कवि को यदि कहीं नर या भगवान के दर्शन होते हैं तो वे केवल अपनी प्रिया में।
क्षण का महत्व
नई कविता में क्षण को अत्यंत महत्व देते हैं। नए कवि क्षण की उपेक्षा नहीं करते। शरीर में जिस प्रकार अंगों को नगण्य नहीं समझा जा सकता वैसे ही काल-शरीर में क्षण-अंगों को महत्वहीन नहीं माना जा सकता। अज्ञेय ने क्षण के महत्व को प्रमुख मानते हुए लिखा है-
एक क्षण
क्षण प्रवहमान
व्याप्त संपूर्णता ।
अज्ञेय ने क्षण में ही संपूर्णत्व, स्थायित्व, अस्तित्व, सत्य के साक्षात दर्शन किए हैं। गजानन मुक्तिबोध ने मृत्यु और कवि शीर्षक रचना में लिखा है-
क्षणभंगुरता के इस क्षण में,
जीवन की गति जीवन का स्वर
दो सौ वर्ष आयु यदि होती तो क्या
अधिक सुखी होता नर।
भोगवाद या वासना की प्रवृत्ति
सुखवाद से प्रभावित नए कवियों ने लोक मर्यादा की ओर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। संयोग श्रृंगार का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करने में नए कवि हिचके नहीं। वासना, मांसलता, इन्द्रीयता इन कवियों में पाई जाती है। पाश्चात्य सिद्धांत eat, drink and be marry को इन कवियों ने पूरी तरह से अपनाया है। शकुंतला माथुर की इन पंक्तियों में संयोग श्रृंगार का उदाहरण है-
चली आई बेला
सुहागिन पायल पहने
बाण बिध हिरनी सी
बाहों में सिमट जाने को
उलझने को लिपट जाने को
मोती की लड़ी समान।
धर्मवीर भारती की कविता में वासना का खुला चित्र है-
जिस दिन से तुमने फूल बिखेरे माथे पर
अपने तुलसी दल जैसे पावन ओंठों से
मैं महज तुम्हारे गर्म वक्ष में
शीश छिपा चिड़ियों के सहमें बच्चे सा
हो गया मूक।
इन उद्धरणों में सुखवाद मांसलता के साथ ही आध्यात्मिकता को भी भौतिकता के धरातल पर खींच लाया है।
वेदना की प्रमुखता
नई कविता में वेदना व्यापक रूप से छाई हुई है। नरेश मेहता की प्रार्थना कविता में वेदना का सुंदर चित्रण हुआ है।
वहन करो ओ मन
ओ मन वन करो पीड़ा।
भारत भूषण अग्रवाल ने भी वेदना के अंदर भविष्य के नए प्रकाश को देखने का प्रयास किया है।
व्यंग्य की प्रधानता
नई कविता में व्यंग्य की प्रधानता सर्वत्र दिखाई देती है। मानव जीवन की विभीषिकाओं, विकटताओं, असफलताओं व अभावों के कारण ये कवि सभ्यता पर व्यंग्य करते हैं-
सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं
न होंगे,
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूं
उत्तर दोगे
फिर कैसे सीखा डसना, विष कहां से पाया।
कुंवर नारायण की कविता 'बहार आई है, में भी शहरी सभ्यता पर प्रकाश डाला गया है।
यह जंगली फूल जो हर साल
हल्ला बोल कर जो शहर में घुस आते हैं
और राह चलते, आते जाते लोगों को
बेशर्मी से घूरते फुसलाते हैं
पर क्या मालूम नहीं
कि शहरों में इनकी सख्त मनाही है।
कि कोई किसी से बिना जान-पहचान बोले
कि देखो बाहर आई है।
विगत दो महायुद्धों का अभिशाप इस देश में भोगा व सहा है।इसके परिणामों से आज का कवि युद्ध का विद्रोह करता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कलाकार और सिपाही आदि कविताएं युद्ध के प्रति व्यंग्यात्मक रचनाएं हैं। भवानी प्रसाद मिश्र का गीत फरोश कवि की विवशता का जीवित चित्र है। नई कविता में व्यंग्य एक बहुत बड़ी शक्ति के रूप में देखा जा सकता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पंक्तियां हैं-
लेकिन मैं देखता हूं कि आज के जमाने में
आदमी से ज्यादा लोग पोस्टरों को पहचानते हैं,
वे आदमी से बड़े सत्य हैं।
भदेश चित्रण
नई कविता में भदेश का चित्रण एक अपनी विशेषता है। नए कवियों ने इन सभी विषयों को स्थान दिया जो अब तक उपेक्षित थे । काव्य में सौंदर्य बोध की परिणति हमारे आनंद बोध में होती है इसलिए करुण, भयानक, रौद्र, विभक्त रसों के साधारणीकरण से हम दुख, डर, विनाश या घृणा की प्राप्ति न कर आनंद के बीच अपनी आत्मा की अवस्थिति पाते हैं।
नई कविता में विरूपता अश्लीलता जैसी कोई चीज ही नहीं मानी गई है। असुंदर का भी सौंदर्य पक्ष में महत्व है ।इसलिए नई कविता ने भदेश, असुंदर और अरूप के प्रति एक प्रकार का आग्रह देखने को मिलता है। नागार्जुन की पंक्तियों में भदेश का बोध होता है-
सरग था ऊपर
नीचे पाताल था
अपच के मारे बहुत बुरा हाल था ।
दिल दिमाग.........।
इस प्रकार की कविताओं में भदेस का चित्रण है
शैली पक्ष
कला पक्ष के क्षेत्र में इस युग में सबसे अधिक प्रयोग हुए हैं ।इनका पहला नारा है भाषा का सर्वथा वैयक्तिक प्रयोग। इसलिए इन्होंने शब्दों में एक नया सारगर्भित अर्थ भरने का प्रयत्न किया है। इसी प्रयत्न में कभी-कभी शब्दों का अनर्गल प्रयोग भी हो गया है।
नई कविता में यौन वर्जनाओं की अभिव्यक्ति प्रतीकों के माध्यम से हुई है। कहीं-कहीं मानसिक उलझनों को अभिव्यक्त करने के लिए भी प्रतीकों का प्रयोग किया है। अतः कुछ इसे प्रतीकवाद भी कहते हैं । इन कवियों ने प्राचीन प्रतीकों के स्थान पर नए प्रतीक लिए हैं । जैसे प्रकाश के लिए दीप मशाल आदि के स्थान पर टॉर्च शब्द का प्रयोग किया है।
सघन जीवन निशा
विद्युत लिए मानो अंधेरे में
बटोही जा रहा हो टॉर्च ले
इसी प्रकार नई कविता में सुंदर बिंबों का प्रयोग हुआ है ।
वर्षा की पहली बूंद को देखकर कवि एक सुंदर बिंब की सृष्टि करता है
बूंद टपकी एक नभ से
किसी ने झुककर झरोखे से
कि जैसे हंस दिया हो
हंस रही थी आँख ने जैसे किसी को
कस दिया हो
इन कवियों ने प्राचीन काल के रूढ़ उपमानों का बहिष्कार करके इनके प्रति विद्रोह प्रकट किया है।
जैसे
चांदनी सदृश चंदन हम क्यों लिखें
मुख कमलों सरीखे क्यों दिखे
हम लिखेंगे चांदनी उस रुपए सी है
जिसमें चमक है पर खनक गायब है
कहीं-कहीं नूतनता का मोह हास्यास्पद बन गया है जैसे
मेरे सपने इस तरह टूट गए
जैसे भुना हुआ पापड़
कहीं-कहीं ध्वन्यात्मकता अथवा ध्वनि चित्र भी सुंदर बन पड़े हैं जैसे
नींद भरे आलिंगन में चूड़ी की फिसलन
आज का कवि मुक्त छंद में विश्वास रखता है। शिवमंगल सिंह सुमन के शब्दों में "भावनाओं की व्यापकता को संवारने के लिए मुक्त छंद बड़ा ही उपयुक्त प्रतीत होता है और युग की चेतना स्वाभाविक रूप से उसकी ओर उन्मुख हो उठी। इन्हीं विचारों के कारण आलोचकों ने इस कविता को काव्य न मानकर गद्य माना है। परंतु कविता का अनिवार्य तत्व भावाभिव्यक्ति जो इन कविताओं में शुद्ध रूप में मिलती है और अतुकांत होते हुए भी यह कविताएं भावों की एक विशेष प्रकार की लय लिए हुए हैं।
नई कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वादात्मक धरातल से मुक्त है। दिनकर के शब्दों में यह शुद्ध साहित्यिक आंदोलन है , कला का आंदोलन है , उसका मुख्य ध्येय हमारी धारणाओं को परिवर्तित करना है।
इस प्रकार नई कविता में वादों की उन्मुक्तता बढ़ती आ रही है । नई कविता की किसी वाद के प्रति रुचि न होने के कारण स्वतंत्र पथ पर अग्रसर होती हुई प्रतीत होती है। इसका सबसे बड़ा योगदान मतवादी धरातल का परित्याग कहा जा सकता है।
नई कविता के संबंध में अज्ञेय के शब्दों में कहा जा सकता है-
फिर भी तुम मरे नहीं तुमसे तुम्हारी
संभावनाएं बढ़ी है।
संघर्षों में बढ़ती हुई नई कविता के प्रति अज्ञेय की यह आस्था अपने आप में नई उपलब्धि है।
आज का कवि स्वतंत्रता, समानता, क्रांति, स्वच्छंदता में विश्वास रखता है। हिंदी साहित्य की आधुनिक कविता के विकास को तीन उत्थानों में बांटा जा सकता है। प्रथम उत्थान की विशेषता भाव परिवर्तन द्वितीय उत्थान की विशेषता भाषा परिवर्तन और तीसरा उत्थान अभिव्यंजना की नवीन प्रणाली है। मानसिक संकीर्णता और विद्वेष को छोड़कर यदि आधुनिक काव्य को पढ़ा जाए तो जीवन के विस्तृत क्षेत्र मिलने के साथ सर्वत्र महान संदेश भी सुनाई देगा।
प्रयोगवाद की भूमिका
प्रगतिवादी काव्यधारा 1936 से 1943 के अंत समय तक ही जीवित रह सकी और उसके पश्चात प्रयोगवाद का जन्म हुआ। प्रगतिवाद के अंत के कई कारण थे- दिनकर के अनुसार "प्रगतिवाद ने साहित्य पर ऐसा कोई भी प्रभाव नहीं डाला जिसे हम किसी भी दृष्टि से साहित्यिक प्रभाव कह सके। यह मुख्यतः असाहित्यिक आंदोलन था जो साहित्य के भीतर केवल राजनीतिक उपयोग के लिए साहित्यकारों का शोषण करने आया था। इसलिए उसे मार्क्सवादी साहित्यिक संस्करण कहा गया। विषय वस्तु भी विषय वस्तु की संकीर्णता .....रूबी के प्रति असंतोष ही प्रगतिवाद के ह्रास का कारण ही नहीं अपितु शिल्प सौंदर्य के प्रति उदासीनता भी कारण था। प्रगतिवाद में कला पक्ष में प्रगति के स्थान पर गति उत्पन्न की।... द्वितीय महायुद्ध के परिणाम स्वरुप में छिपी अनेक भावनाएं वे चिंताएं छिपकर आ रही थी जीवन अपने शहर सरलता खो रहा था।...... युद्ध के कारण मानव मूल्यों में अस्थिरता गई थी। शाश्वत और चिरंतन मूल्यों पर एक प्रश्न चिन्ह लग गया था। पुरानी आस्थाएं टूट गई पर नई स्थान नहीं ले पा रही थी। इसी प्रकार मानव मूल्यों में अराजकता, अस्थिरता, बिखराव पनप रहा था। उसमें भाव बोध को व्यक्त करने के लिए नई तकनीक की आवश्यकता महसूस हुई और परिणाम स्वरुप प्रयोगवाद का जन्म हुआ।
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