हिंदसा

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

रोटी और संसद



'रोटी और संसद' का मूल पाठ इस प्रकार है-

'रोटी और संसद'

एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूं......

'यह तीसरा आदमी कौन है?'

                                                         मेरे देश की संसद मौन है।
काव्य-संग्रह : संसद से सड़क तक|
शब्दार्थ: आदमी= मनुष्य, रोटी बेलना= गूंथे हुए आटे को रोटी का आकार देना, खाना= भोजन करना, खेलना= मनोरंजन करना, संसद= हमारे देश की सत्ता का गलियारा|

भावार्थ :
कवि ने इस कविता में देश की भ्रष्ट व्यवस्था की पोल खोली है और देश की संसद अर्थात सरकार से पूछा है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? अन्न दाता किसान या दूसरे गरीब तबके को अनदेखा क्यों किया जाता है ? कविता में तीन आदमी हैं, एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है और एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है और न खाता है, बल्कि रोटी से खेलता है | रोटी बेलने वाला पहला आदमी किसान है, या यह आदमी आज के समय का मजदूर या सर्वहारा वर्ग है जोकि रोटी को पैदा करता है, यानी खेत में अन्न उगाता है। यह रोज नए सिरे से अपने संघर्ष की शुरुआत करता है। भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है और चिंता की बात है कि यही वर्ग राष्ट्रीय चिंतन के दायरे से बाहर रहता है। इसकी चिंता बस दिखावे के लिए की जाती है या सिर्फ औपचारिक खानापूर्ति के लिए या बस खासकर चुनाव के दिनों में| इस वर्ग की चिंता प्रत्येक राजनैतिक दल करता है। सत्तारूढ़ दल इस वर्ग के लिए औपचारिक रूप से कागज़ पर अनेक योजनाएं बनाता है। जमीनी हकीकत यह है कि इन योजनाओं का इस वर्ग को कोई फायदा नहीं मिलता क्योंकि अगर इन योजनाओं का लाभ वास्तव में इस वर्ग को मिलता तो देश का कोई भी किसान आत्महत्या नहीं करता| 'मोचीराम' कविता भी धूमिल की प्रसिद्ध कविता है और ऐसा लगता है कि सुदामा पांडे धूमिल के काव्य का पहला आदमी मोचीराम, पलटू जैसा आदमी ही है, जो रोटी बेलता है और आए दिन आत्महत्या करने को मजबूर होता है| पहला आदमी मेहनत करता है और उसका लाभ दूसरा और तीसरा व्यक्ति मिलकर उठाता है।
दूसरा आदमी रोटी खाता है। यह दूसरा आदमी उपभोक्ता वर्ग है, समान्य या निम्न मध्य वर्ग है । पहले इस वर्ग में डॉक्टर, वकील, पुरोहित भी आते थे लेकिन अब अधिक से अधिक मुनाफाकमाने की प्रवृत्ति के कारण ये सब तीसरे आदमी के वर्ग में शामिल हो गए हैं । दूसरा आदमी जो रोटी खाता है वह ऐसा वर्ग है जो एक छोटी-सी नौकरी के लिए, एक प्याली चाय के लिए, शराब के लिए, एक गुलाबी खुशबू के लिए, मुनाफाखोरी में शामिल हो जाता है और छोटे से स्वार्थ के लिए अक्सर अपना ईमान भेज देता है| यह एक ऐसा मध्यमवर्ग है जिसे गुलाम रहने की आदत सी पड़ गई है|
यह तीसरा आदमी वह है जो किसानों या मेहनत करने वाले आदमी की रोटी से खेलता है। इसके पास खाने की कोई कमी नहीं होती | इसे आप हम देश के विभिन्न भागों में देख सकते हैं, यह मुनाफाखोरी करने वाला वर्ग है या कहें यह पूंजीवादी वर्ग है, जो रोटी से खेलता है और मुनाफा कमाने के लिए जनता को हर बार भटकाने से बाज नहीं आता। या सच कहें तो यह तीसरा आदमी हमारे भ्रष्टाचारी नेता हैं जो संसद में बैठकर अपनी मर्जी से रोटी को पैदा करने वाले अन्न का मूल्य तय करते हैं और फिर मजबूर होकर कर्ज में डूबा देश का किसान आत्महत्या करता है।


रोटी और संसद का प्रतिपाद्य
सुदामा पांडे धूमिल की यह कविता उनके काव्य संग्रह 'संसद से सड़क तक' से ली गई है। देखने में यह कविता बहुत सीधी और सरल लगती है लेकिन इस कविता का गहरा अर्थ है , यह कविता बहुत गहरी बात कहती है। बेशक यह दिखने में चंद लाइने दिखती हैं। लेकिन यह चंद लाइने हमारे देश की भ्रष्ट व्यवस्था और देश के किसानों और गरीब तबके के लोगों के हालातों को बयान करती है। आज ऐसे वक्त में, जब देश का किसान आत्महत्या कर रहा है, जब देश में आए दिन अनेक भूखमरी की दर्दनाक घटनाएं सामने आती हैं, तब यह कविता और भी प्रासंगिक हो जाती है। कड़वा सच यह है कि आज भी देश की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो दिहाड़ी-मजदूरी करके एक दिन की रोटी का जुगाड़ कर लेती है और अगले दिन की रोटी का क्या होगा, मिलेगी या नहीं, उसे नहीं पता होता, उनकी जिंदगी दिन-रात दो जून की रोटी के आगे पीछे घूम रही होती है। धूमिल की यह कविता देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी भारत की संसद अर्थात देश को संचालित करने वाली सत्ता से सवाल करती है कि ये देश के लोगों की रोजी-रोटी से खेलने वाला तीसरा आदमी कौन है ? धूमिल से पहले हिंदी कविता में यही सवाल मुक्तिबोध, नागार्जुन और निराला जैसे कवि भी उठाते हैं। क्योंकि माना जाता है कि सत्ता से पूछे गए ऐसे सवाल देश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करते हैं लेकिन देखा जाए तो आजकल के लोकतंत्र की सरकारों पर ऐसे सवालों का कोई असर नही होता। बेरोजगारी का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। देश में जो अमीर हैं वे और अमीर और जो गरीब हैं वे और गरीब होते जा रहे हैं। इन तबके को रोटी खाने को नसीब नहीं हो रही और दूसरा तबका उस रोटी से खेलता है अर्थात उसजे महत्त्व को नहीं समझता। धूमिल बेबाक लिखने वाले सशक्त राजनीतिक चेतना के कवि थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया था, बहुत कुछ झेला था, उन्होंने आम मनुष्य के जीवन से जुड़ी समस्याओं की चिंताओं के साथ अपने जीवन को जिया था। अतः उनका रचनाकार मन उन सभी चिन्ताओ को कविता में रखे बिना रह न सका। इस तरह इस कविता में धूमिल भारत की संसद से प्रश्न पूछकर हमारी संसद को कटघरे में खड़ा कर देता है।

तीसरा वह आदमी है जो रोटी से खेलता है वह आदमी है मुनाफाखोर, शोषक वर्ग, पूंजीपति वर्ग, हमारा भ्रष्ट नेता वर्ग| सामान्य वर्ग इसे अपने आस-पास देश के विभिन्न हिस्सों में देख सकते हैं | कवि सवाल पूछता है कि यह तीसरा आदमी कौन है जो गरीब या किसान के द्वारा पैदा की गई रोटी से खेलता है| संसद में गद्दीदार कुर्सियों पर आसीन होकर हमारे भ्रष्ट नेता निरंतर बोलते हैं लकिन इस सवाल वे सब चुप हैं | वास्तव में कवि कहना चाहता है कि संसद से सड़क तक संप्रदाय, लूट, हत्या, बलात्कार, भय का दर्शन बांटने वाला और अपनी-अपनी कुर्सी की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नेता ही वह तीसरा आदमी है | जो प्रजातंत्र में निहित भ्रष्टाचार का जन्म दाता है|
'रोटी और संसद' का तीसरा आदमी वह है जो संसद में पहले आदमी के द्वारा चुनकर जनप्रतिनिधि के रूप में आता है जो उनके धर्म का है, जो उनकी जाति का है, उन्हीं के बीच का आदमी है, और राजनीति की सड़क के माध्यम से संसद में आता है| लेकिन संसद में आते ही वह पहले आदमी की रोटी का स्वामी बन जाता है| पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व बन जाता है| जनता का शोषक बन जाता है| इसलिए किसान मालिक की जगह एक मजदूर नहीं बन जाता है | मुनाफाखोर वर्ग किसान की रोटी खाता है| वह किसी भी स्थिति में रोटी हथियाने के अलावा कुछ नहीं कर सकता| तीसरे आदमी के रूप में नेता हैं जो जनता के जनप्रतिनिधि होते हैं वे सड़क से चलकर जरूर आते हैं किंतु संसद में बैठते ही उनका वर्ग, जाति, भाषा सब कुछ बदल जाता है | भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था की धूमिल पोल खोलकर रख देता है| तीसरा आदमी इतना सक्षम और इतना विशिष्ट हो कैसे गया, जिसके विरुद्ध इस देश की संसद तक मौन है। यह तीसरा आदमी गरीब की रोटी से खेलता दिखाई देता है| यही कारण है कि आम आदमी के सामने धूमिल की कविता जीवन सत्य को उखाड़ कर रख देती है।

कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह भी कोई कविता है। न कोई छंद, न अलंकार, न प्रतीक, कवि कविता न लिख कर  रोजमर्रा की भाषा में किसी से सवाल पूछ रहा है कि यह तीसरा आदमी कौन है?  ऐसा लगता है जैसेकि किसी ने बैठी हुई जनता के बीच से खड़े होकर संसद से सवाल पूछा हो- कि मैं पूछता हूं कि यह तीसरा आदमी कौन है ? जो गरीब की रोटी से खेलता है और संसद में कुर्सी पर आसीन होने के बावजूद सवालों का जबाब न देकर मौन है ।

संभावित प्रश्न:
1.सुदामा पांडे धूमिल का साहित्यिक परिचय लिखिए |
2.सुदामा पांडे धूमिल रचित रोटी और संसद कविता का भावार्थ लिखिए|
3. रोटी और संसद कविता की मूल संवेदना लिखिए|
4, 'धूमिल की कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंग की पीड़ा और आक्रोश की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है' रोटी और संसद कविता के आधार पर कथन का विवेचन कीजिए|

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