अलंकार युग्मों में अंतर
श्लेष अलंकार और यमक अलंकार
यमक अलंकार में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आता है और उसका अर्थ हर बार भिन्न होता है |
जैसे
"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर|
कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर||
यहां मन का शब्द की आवृत्ति हुई है एक जगह अर्थ है मन (चित या दिल )और दूसरा अर्थ है माला का मनका। यहां पर मनका शब्द के कई अर्थ होने के कारण यमक अलंकार है| श्लेष अलंकार में श्लेष का अर्थ है चिपका हुआ। जिस काव्य रचना में एक शब्द एक ही बार प्रयोग हो किंतु उसके दो या दो से अधिक अर्थ हो उसे श्लेष अलंकार कहते हैं|
अंतर =
यमक और श्लेष दोनों ही शब्दालंकार है यह इनकी समानता है यमक और श्लेष में अंतर यह है कि यमक में एक ही शब्द की भिन्न अर्थों में आवृत्ति होती है जबकि/में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते हैं
उपमा और रूपक अलंकार-
उपमा अलंकार में जब किसी वस्तु का वर्णन करके उससे अधिक प्रसिद्ध किसी वस्तु से उसकी समानता की जाती है तो वहां पर उपमा अलंकार होता है|
जब उपमेय और उपमान में समता इस तरह बताई जाए कि वह दोनों एक ही जान पड़े तब वहां पर रूपक अलंकार होता है इसमें संदेह नहीं कि रूपक में उपमेय और उपमान भिन्न होते हैं। वे एक नहीं होते लेकिन फिर भी दोनों एक ही मालूम होने लगते हैं। रूपक में उपमेय और उपमान में एकरूपता होती है।
अंतर=
उपमा और रूपक दोनों ही अर्थालंकार हैं | इन दोनों में अंतर यह है कि उपमेय और उपमान में सादृश्य की योजना करने वाले अलंकार का नाम उपमा है जबकि जहां उपमेय और उपमान का केवल सादृश्य नहीं दिखाया जाता अपितु दोनों को एक ही बना दिया जाता है| अर्थात उपमेय में उपमान का भेद आरोप कर दिया जाता है तो वहां रूपक अलंकार होता है उपमा में दो वस्तुओं का सादृश्य दिखाया जाता है जबकि रूपक में उपमेय को अपमान ही बताया जाता है| उपमा का अर्थ तुलना रूपक का अर्थ रूप का आरोप करना है|
प्रतीक और व्यतिरेक अलंकार-
प्रदीप का अर्थ है विपरीतया उल्टा। इस अलंकार में उपमान में उपमेय की कल्पना करना तथा अनेक प्रकार की विपरीतता दिखाई जाती है। व्यतिरेक अलंकार- जिस काव्य रचना में उपमान की उपेक्षा उपमेय के वर्णन में किसी विशेष योग्यता को दिखाकर अधिक उत्कृष्टता दिखाई जाती है, उसे व्यतिरेक अलंकार कहते हैं। यहां उपमान की अपेक्षा उपमेय को अधिक बताया जाता है
अंतर =
प्रदीप और व्यतिरेक दोनों भेद प्रधान अलंकार हैं| यह दोनों की समानता है| लेकिन इन दोनों में अंतर भी स्पष्ट है| प्रतीप अलंकार में उपमान में उपमेय में की कल्पना या अनेक प्रकार की विपरीतता दिखाई जाती है किंतु व्यतिरेक में उपमान की अपेक्षा उपमेय के वर्णन में उत्कृष्टता दिखाई जाती है।
विभावना और विशेषोक्ति अलंकार -
विभावना अलंकार जब कारण नहीं होता और उसके बिना ही कार्य हो जाता है| तब विभावना अलंकार होता है| कारण के बिना कार्य होने के लिए उसके संबंध में किसी विशेषणवाद की कल्पना की जाती है
विशेषोक्ति अलंकार - जब कारण उपस्थित होने पर भी कार्य नहीं होता तब विशेषोक्ति अलंकार होता है
अंतर=
दोनों ही अलंकारों में कारण और कार्य के संबंध चित्रण के द्वारा चमत्कार की उद्भावना की जाती है| यह दोनों में समानता है|
दोनों के बीच अंतर भी स्पष्ट है विभावना अलंकार में कार्य होने पर भी कार्य सिद्ध हो जाता है जबकि विशेषोक्ति में कारण के उपस्थित होने पर भी कार्य सिद्ध नहीं होता|
अतिशयोक्ति और अनयुक्ति अलंकार-
अतिशयोक्ति अलंकार जहां उपमेय का वर्णन लोक सीमा से अधिक बढ़ा-चढ़ा कर किया जाए वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है| जबकि अत्युक्ति अलंकार में रोचकता लाने के लिए किसी योग्य पुरुष के विषय में बढ़ी -चढ़ी हुई झूठी बात कही जाती है |यदि उक्ति संभव हो तो अतिशयोक्ति होगी, यदि संभव न हो तो अत्युक्ति अलंकार होता है |
अंतर=
अतिशयोक्ति और अत्युक्ति अलंकार में यह समानता है कि दोनों में बात बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती है| दोनों में अंतर यह है कि अतिशयोक्ति में जो बात बढ़ा चढ़ाकर कही जाती है वह संभव होती है किंतु अत्युक्ति में जो बात बढ़ा चढ़ाकर कही जाती है वह असंभव होती है |
श्लेष अलंकार और यमक अलंकार
यमक अलंकार में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आता है और उसका अर्थ हर बार भिन्न होता है |
जैसे
"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर|
कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर||
यहां मन का शब्द की आवृत्ति हुई है एक जगह अर्थ है मन (चित या दिल )और दूसरा अर्थ है माला का मनका। यहां पर मनका शब्द के कई अर्थ होने के कारण यमक अलंकार है| श्लेष अलंकार में श्लेष का अर्थ है चिपका हुआ। जिस काव्य रचना में एक शब्द एक ही बार प्रयोग हो किंतु उसके दो या दो से अधिक अर्थ हो उसे श्लेष अलंकार कहते हैं|
अंतर =
यमक और श्लेष दोनों ही शब्दालंकार है यह इनकी समानता है यमक और श्लेष में अंतर यह है कि यमक में एक ही शब्द की भिन्न अर्थों में आवृत्ति होती है जबकि/में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते हैं
उपमा और रूपक अलंकार-
उपमा अलंकार में जब किसी वस्तु का वर्णन करके उससे अधिक प्रसिद्ध किसी वस्तु से उसकी समानता की जाती है तो वहां पर उपमा अलंकार होता है|
जब उपमेय और उपमान में समता इस तरह बताई जाए कि वह दोनों एक ही जान पड़े तब वहां पर रूपक अलंकार होता है इसमें संदेह नहीं कि रूपक में उपमेय और उपमान भिन्न होते हैं। वे एक नहीं होते लेकिन फिर भी दोनों एक ही मालूम होने लगते हैं। रूपक में उपमेय और उपमान में एकरूपता होती है।
अंतर=
उपमा और रूपक दोनों ही अर्थालंकार हैं | इन दोनों में अंतर यह है कि उपमेय और उपमान में सादृश्य की योजना करने वाले अलंकार का नाम उपमा है जबकि जहां उपमेय और उपमान का केवल सादृश्य नहीं दिखाया जाता अपितु दोनों को एक ही बना दिया जाता है| अर्थात उपमेय में उपमान का भेद आरोप कर दिया जाता है तो वहां रूपक अलंकार होता है उपमा में दो वस्तुओं का सादृश्य दिखाया जाता है जबकि रूपक में उपमेय को अपमान ही बताया जाता है| उपमा का अर्थ तुलना रूपक का अर्थ रूप का आरोप करना है|
प्रतीक और व्यतिरेक अलंकार-
प्रदीप का अर्थ है विपरीतया उल्टा। इस अलंकार में उपमान में उपमेय की कल्पना करना तथा अनेक प्रकार की विपरीतता दिखाई जाती है। व्यतिरेक अलंकार- जिस काव्य रचना में उपमान की उपेक्षा उपमेय के वर्णन में किसी विशेष योग्यता को दिखाकर अधिक उत्कृष्टता दिखाई जाती है, उसे व्यतिरेक अलंकार कहते हैं। यहां उपमान की अपेक्षा उपमेय को अधिक बताया जाता है
अंतर =
प्रदीप और व्यतिरेक दोनों भेद प्रधान अलंकार हैं| यह दोनों की समानता है| लेकिन इन दोनों में अंतर भी स्पष्ट है| प्रतीप अलंकार में उपमान में उपमेय में की कल्पना या अनेक प्रकार की विपरीतता दिखाई जाती है किंतु व्यतिरेक में उपमान की अपेक्षा उपमेय के वर्णन में उत्कृष्टता दिखाई जाती है।
विभावना और विशेषोक्ति अलंकार -
विभावना अलंकार जब कारण नहीं होता और उसके बिना ही कार्य हो जाता है| तब विभावना अलंकार होता है| कारण के बिना कार्य होने के लिए उसके संबंध में किसी विशेषणवाद की कल्पना की जाती है
विशेषोक्ति अलंकार - जब कारण उपस्थित होने पर भी कार्य नहीं होता तब विशेषोक्ति अलंकार होता है
अंतर=
दोनों ही अलंकारों में कारण और कार्य के संबंध चित्रण के द्वारा चमत्कार की उद्भावना की जाती है| यह दोनों में समानता है|
दोनों के बीच अंतर भी स्पष्ट है विभावना अलंकार में कार्य होने पर भी कार्य सिद्ध हो जाता है जबकि विशेषोक्ति में कारण के उपस्थित होने पर भी कार्य सिद्ध नहीं होता|
अतिशयोक्ति और अनयुक्ति अलंकार-
अतिशयोक्ति अलंकार जहां उपमेय का वर्णन लोक सीमा से अधिक बढ़ा-चढ़ा कर किया जाए वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है| जबकि अत्युक्ति अलंकार में रोचकता लाने के लिए किसी योग्य पुरुष के विषय में बढ़ी -चढ़ी हुई झूठी बात कही जाती है |यदि उक्ति संभव हो तो अतिशयोक्ति होगी, यदि संभव न हो तो अत्युक्ति अलंकार होता है |
अंतर=
अतिशयोक्ति और अत्युक्ति अलंकार में यह समानता है कि दोनों में बात बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती है| दोनों में अंतर यह है कि अतिशयोक्ति में जो बात बढ़ा चढ़ाकर कही जाती है वह संभव होती है किंतु अत्युक्ति में जो बात बढ़ा चढ़ाकर कही जाती है वह असंभव होती है |
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