हिंदसा

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

रस के अंग

  रस के अंग

रस सिद्धांत जो सबसे प्राचीन सिद्धांत है इस सिद्धांत को लेकर आगे  आने वाले काव्य शास्त्रियों ने विस्तार से चिंतन किया है भरतमुनि के इस नाट्य सूत्र में ही रस के सारे अंग आ जाते हैं |

वह कहते हैं-  “विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पति”

 विभाव ,अनुभाव और व्यभिचारी इन तीनों के सहयोग से रस की निष्पत्ति होती है,

अब यह जो तीनों है- विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी, (व्यभिचारी भावों को ही संचारी भाव कहा जाता है) और इसके साथ स्थाई भाव, यही रस के चार अंग हैं - स्थाई, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी| विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों का जब स्थाई भाव के साथ संयोग होता है, तब मूल रूप में  स्थाई भाव ही होते हैं, जो रस रूप में परिणत होते हैं| इस प्रकार स्थाई भावों के सहयोगी बनते हैं- विभाव, अनुभाव और संचारी भाव, यही रस के चार अंग हैं|
इनकी चारों की विशेषता और स्वरूप इस प्रकार है-

स्थाई भाव -
स्थाई भाव के विषय में आचार्य विश्वनाथ ने साहित्य दर्पण में उसकी परिभाषा  दी है जिसमें उन्होंने कहा है कि जो सहृदय है, जो प्रेक्षक है या जो सामाजिक है, उसके ह्रदय में वासना रूप में चिरकाल से रहने वाले उस भाव को स्थाई भाव कहा जाता है, जिसे अनुकूल अथवा प्रतिकूल भाव छिपा या दबा नहीं सकते|  कोई विपरीत या विरोधी स्थिति भी स्थाई भाव को ना तो तिरोहित कर सकती है और ना दबा सकती है ना छुपा सकती है और स्थाई भाव विभाव अनुभाव के सहयोग से ही रस रूप में परिणत हो जाता है| स्थाई भाव रस नहीं होता है, लेकिन यह स्थाई भाव रस रूप में अभिव्यक्त होता है| कब ? जब विभाव  आदि का सहयोग प्राप्त होता है| और वह सागर तुल्य होता है जिस तरह से सागर अपने भीतर सब कुछ समेट लेता है, अपने भीतर समाहित कर लेता है और वह स्वयं गंभीर रूप में रहता है उसी तरह से स्थाई भाव भी स्थिर रहते हैं ,यह स्थाई भाव नित्य होते हैं और वह भी अपने सारे विरोघी भावों को आत्मसात करके रस रूप में परिणत हो जाता है |

रस का स्थाई भाव के साथ संबंध - स्थाई भाव तो भाव है उनका रस के साथ क्या संबंध है?  देखिए स्थाई भाव और रस के बीच का सम्बन्ध मिटटी और गंध के सम्बन्ध जैसा है, जैसे मिट्टी के अंदर उसकी गंध रहती है पर हम उसकी गंध को देख नहीं पाते हैं, अनुभव नहीं कर पाते हैं पर जैसे ही मिट्टी के साथ जल का संयोग होता है अर्थात  वर्षा होती है तो वर्षा की बूंदे जैसे ही मिट्टी पर पड़ती है तो मिट्टी में से भीनी भीनी सुगंध आती है तो वह गंध कहीं बाहर से नहीं आई है वह तो मिट्टी के अंदर ही विद्यमान थी, लेकिन जैसे ही जल का संयोग  प्राप्त हुआ तो वह गंध प्रकट हो गई| इसी तरह से स्थाई भाव हैं , जो सहृदय के ह्रदय में सुप्त अवस्था में, वासना रूप में विद्यमान रहते हैं और जैसे ही उन्हें उपयुक्त कारण मिलता है वैसे ही वे रस रूप में परिणत हो जाते हैं | जैसे हम देखते हैं दूध से दही बनती है, लेकिन हम दूध में दही नहीं देख पाते, लेकिन जैसे ही दही में जामन लगाते हैं तो वह दूध दही के रूप में परिणत हो जाता है| अत: उसी प्रकार से स्थाई भाव भी विभाव, अनुभाव आदि का संयोग पाकर रस के रूप में परिणत हो जाते हैं| 

                      भाव जब रस के रूप में  परिणत होते हैं तो उससे पहले ये भाव ही कहलाएंगे|  रस की अवस्था से पहले वे भाव कहलाते हैं और आस्वादन की अवस्था में वे उनकी संज्ञा  रस हो जाती है और स्थाई भाव पूर्व सिद्ध है और रस पूर्व सिद्ध नहीं है | अर्थात स्थाई भाव को जब विभाव आदि का संयोग प्राप्त होता है उससे पहले वह भाव है, रस नहीं है |
स्थाई भावों की संख्या की बात करते हैं कि कितने स्थाई भाव होते हैं ? सबसे पहले आचार्य भरतमुनि ने  रसों की संख्या निश्चित की है\ उन्होंने नौ रस गिनवाये हैं और उन नौ रसों में से नाटक के लिए उन्होंने 8 रसों को माना है, नाटक के संदर्भ में उन्होंने नौ रस नहीं माने, 8 रस माने हैं|
पहला स्थाई भाव है रति|  रति का अर्थ है प्रेम | जब स्त्री पुरुष  में एक दूसरे के प्रति आकर्षण होता है, जो प्रेम भाव होता है वह रति है , जो  सहृदय में स्थाई भाव के रूप में रहता है|
दूसरा स्थाई भाव है हास-  कोई विकृत वेशभूषा देखी, या दृश्य देखा जिसे हास  भाव जागृत होता है 
तीसरा शोक है-  जब किसी अपने की मृत्यु हो गई या खो गया, या अनिष्ट की प्राप्ति हो जाए , कुछ भयंकर संकट आ जाए तो उसके कारण जो शोक का भाव जागृत होता है वह शोक  कहलाता है
इसी तरह से क्रोध स्थाई भाव है - शत्रु द्वारा किया गया अपमान, तिरस्कार आदि क्रोध के रूप में जागृत हो जाता है
अगला स्थाई भाव  है - भय जब कोई ऐसा दृश्य देख लिया कि अपने भीतर भय का भाव जागृत हो जाता है 
इसी तरह से उत्साह  भी स्थाई भाव है और उत्साह स्थाई भाव शौर्य, वीरता , युद्ध में पराक्रम   दिखाने संबंधी जो जोश उत्पन्न होता है जिससे वीर रस की उत्पत्ति होती है उसका  उत्साह स्थाई भाव है
अगला स्थाई भाव है जूगुप्सा  - किसी वस्तु को देखकर  जूगुप्सा या घृणा का भाव जागृत हो जाता है एक तिरस्कार का भाव जागृत हो जाता है| किसी व्यक्ति देखकर  जुगुप्सा का भाव जागृत होता है|
अगला स्थाई भाव विस्मय होता है- अर्थात  हैरान हो जाना ,आश्चर्यचकित हो जाना, कुछ ऐसा देखा जिसको देखकर स्तब्ध रह गए, हैरान रह गए तो वह विस्मय का भाव होता है
स्थाई भाव है निर्वेद  या शम - संसार को देख कर मन में जो विरक्ति का भाव पैदा हो जाता है,  मन में एक शांति का भाव शम का भाव पैदा हो जाता है तो उसे निर्वेद  या शम कहते हैं और भरत मुनि ने इस निर्वेद या शम को ही नाटक के संदर्भ में रस की  गणना नहीं की है| 
 भक्ति काल तक आते-आते कृष्ण भक्त कवियों ने जो मां यशोदा और कृष्ण के प्रेम संबंध को चित्रित किया तो उसके लिए उसके लिए उन्होंने वत्सल स्थाई भाव माना |  जिससे वात्सल्य रस की निष्पत्ति होती है तो यह वत्सल स्थाई भाव भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नहीं मिलता परवर्ती काल में मिलता है|
 इसी तरह से भक्ति   ईश्वर के प्रति जो प्रेम भाव है उसको जो श्रृंगार रस के रूप से भिन्न माना गया और भक्ति कालीन कवियों ने उसके लिए भक्ति स्थाई  भाव  माना है जो  उसके लिए अलग से एक रस की कल्पना की जिसे भक्ति रस नाम दिया गया तो इस तरह से प्रारंभ में 9 स्थाई भाव माने गए और बाद में वत्सल और भक्ति रस को मानकर के 11 स्थाई भाव माने गए |
 ये  जो स्थाई भाव हैं ये  मनोविज्ञान से जुड़े हुए हैं | भारतीय काव्यशास्त्र में भावों का जो चित्रण है उसका  मनोवैज्ञानिक आधार है | मनोविज्ञान में मूल प्रवृत्तियां 15 मानी गई है और उन प्रवृत्तियों के आधार पर ही स्थाई भावों की परिकल्पना की गई है| जैसे- काम-प्रवृत्ति के लिए रति नामक भाव है और उससे श्रृंगार रस की निष्पति होती है| जिज्ञासा प्रवृत्ति के लिए विस्मय नामक भाव और उससे अद्भुत रस की निष्पति होती है |
अब हम बात करते हैं विभाव्  की |  सामान्य जीवन में जिसे हम कारण कहते हैं,  हेतु कहते हैं , निमित्त कहते हैं, वही काव्यशास्त्र में विभाव के नाम से जाना जाता है|  सामाजिक के ह्रदय में वासना रूप में स्थित स्थाई भाव को आस्वादन करने योग्य बनाने वाले कारणों और तत्वों को विभाव कहा जाता है वह कारण जो स्थाई भाव को रस रूप में परिणत करने में सहायक या सहयोगी बनते हैं | आचार्य विश्वनाथ ने साहित्य दर्पण में इस को परिभाषित किया है|  उन्होंने कहा है कि रति आदि जो स्थाई भाव हैं उनको उद्दीप्त करने वाले जो लोक में कारण हैं , वही शास्त्र में विभाव हैं, वे काव्य नाटक आदि में विभाव के नाम से जाने जाते हैं| 
 विभाव के दो भेद हैं- 
 आलंबन विभाव
 उद्दीपन विभाव  (का अर्थ -बढ़ाना ) 
आलंबन विभाव को परिभाषित करते हुए विश्वनाथ कहते हैं किनायक, नायिका आदि आलंबन हैं |       
आलंबन विभाव के भी दो भेद हैं-
 एक आश्रय 
 दूसरा विषय
 जिसके मन में स्थाई भाव जागृत हो रहा है वह आश्रय कहलायेगा और जिसके प्रति  स्थाई भाव जागृत हो रहा है वह विषय कहलाएगा जैसे- नायिका को देखकर नायक के मन में रति भाव जागृत हो रहा है तो नायक आश्रय कहलाएगा, नायिका विषय कहलाएगी  
उद्दीपन विभाव -
यह जो आलंबन विभाव है ,जो स्थाई भाव को जागृत कर रहे हैं,  इन स्थाई भावों को उद्दीप्त करने वाले, उनको बढ़ाने वाले जो कारण है, वे उद्दीपन विभाव कहलाएंगे | अतः उसको उद्दीपन विभाव कहते हैं जो रति आदि स्थाई भाव जागृत हो गए उनको उद्दीप्त करने वाले विभाव हैं 
उद्दीपन विभाव के दो भेद हैं-
विषय निष्ट  
बाह्य कारण 
विषय निष्ट - जैसे नायिका को देखकर नायक के मन में रति भाव जागृत हो रहा है तो नायिका का जो सौंदर्य है वह विषय निष्ट  कहलाएगा और जो नायिका की चेष्टाए हैं , उसका कार्य व्यापार है, उसकी वेशभूषा आदि हैं - वह बाह्य  कारण कहलाएंगे|  जैसे शेर को देखकर भय का भाव जागृत हो गया तो जो शेर है वह विषय कहलायेगा और अंधेरे का समय आदि जो बाह्य वातावरण है वह बाह्य  कहलाएंगे|  
इसके बाद अगला अंग है अनुभाव-  जब सहृदय के हृदय में स्थाई भाव जागृत हो गया तो उसके पश्चात जो सहृदय  है वह क्या चेष्टाएँ करता है उसका जो आलंबन है उसकी जो चेष्टाएँ हैं, उसके द्वारा किया गया जो कार्य व्यापार है , वह अनुभाव कहलाता है|  अनुभाव का शाब्दिक अर्थ है- भावनाओं के पश्चात जो पैदा होता है| पहले भाव आया और उसके पश्चात जो आएगा वह अनुभाव कहलाएगा| जैसे रति आदि स्थाई भाव के पश्चात जो कार्य व्यापार उत्पन्न  हो रहा है वह अनुभाव कहलाएगा | अर्थात जो स्थाई भाव को अनुभव कराते हैं अनुभाव है , जैसे लोक में हम कार्य कहते हैं उसे ही काव्य, नाटक में हम अनुभाव के नाम से जानते हैं|  सामान्य शब्दों में उसे कार्य कहेंगे और शास्त्रीय शब्दावली में उसे अनुभाव कहेंगे
और यह अनुभाव चार प्रकार के होते हैं- 
कायिक 
वाचिक
आहार्य और 
सात्विक
  •  कायिक से अभिप्राय है - शरीर से संबंधित| जो शरीर की चेष्टाए हैं वे कायिक  कहलाएंगे जैसे- वह स्थाई भाव जागृत हुआतो उसके बाद भागने, डरने लगना , यह का कायिक अनुभाव  कहलाएंगे 
  • वाचिक - वाक् व्यापर ,  मुख से कुछ बोलना |  वाचिक व्यापार कहलाता है| जैसे करुण रस में है तो रोने का भाव जागृत हुआ, रोने के साथ-साथ मुंह से चित्कार करना,  अलग अलग ध्वनियां निकालना, वह वाचिक अनुभाव कहलाएगा
  • आहार्य होता है वेशभूषा से संबंधित-  जो वेशभूषा है -जैसे क्रोध में काले वस्त्र धारण कर लेना यह आहार्य है|  श्रंगार रस है- तो लाल वस्त्र धारण करना तो वेशभूषा से संबंधित या हास्य रस है तो विकृत वेशभूषा धारण करना जिसको देखकर हास  का भाव जागृत होना तो यह आहार्य कहलाते हैं 
  • सात्विक भाव - जो पहले तीन की चर्चा हमने की है | इन तीनों को इच्छित अनुभाव  कहा जाता है या यत्नज अनुभाव कहा जाता है| इतना मतलब यह है कि हम इनको करने के लिए प्रयास करते हैं|  हम अपनी ओर से प्रयास करते हैं और जो सात्विक अनुभाव हैं उनके लिए हमें कोई प्रयास नहीं करना पड़ता सात्विक अनुभाव  अयत्नज होते हैं वह अपने आप हो जाते हैं और यह सात्विक अनुभाव 8 कहलाते हैं-
  1.  स्तम्भ- कुछ ऐसा देख लेना कि उसके बाद शारीरिक चेष्टा एकदम रुक जाए,मुख से कुछ ना निकले
  2.  स्वेद-  क्रोध के कारण भय के कारण पसीना श्रम के कारण पसीना आना स्वेद कहलाता है
  3.  रोमांच- ऐसे ही रोमांच रोम-रोम प्रफुल्लित हो जाना या भय के कारण रोंगटे खड़े हो जाना वह रोमांच कहलाता है 
  4. स्वरभंग- स्वर भंग गला रुक जाना मुंह से आवाज ही ना निकल ना भय के कारण आवाज रुक गई अप्रसन्नता है तो अचानक कुछ ऐसा देख लिया कि गला रुक गया और आवाज रुक गई 
  5. वेपथु- वेपथु होता है कंपन का अपना शरीर कांपने लग जाना यह अवस्था अत्यधिक हर्ष के कारण भी होती है अत्यधिक सो के कारण भी होती है और भय के कारण भी होती है
  6.  वैवर्ण्य- पीला पड़ जाना फीका पड़ जाना मलीन पर जाना
  7.  अश्रु -अश्रु बहने लगना
  8.  प्रलय - प्रलय से अभिप्राय है अवस्था मूर्छित हो जाना है | यह आठ सात्विक अनुभाव है जो स्थाई भाव जागृत होने के बाद आलंबन के द्वारा जो चेष्टाएँ  की जाती है वह अनुभाव कहलाते हैं |
रस के अंगों की अलग-अलग बात करने पर ऐसा लगता है इन सबको घटने में बहुत टाइम लगता होगा लेकिन ऐसा नहीं है, वास्तव में यह सब इतनी जल्दी हो जाता है कि क्षण भर का भी अंतराल अंतर नहीं रहता, विभाव आते ही स्थाई भाव जागृत हुआ और उसके साथ ही अनुभाव प्रारंभ हो जाता है| यह सब कार्य व्यापार साथ -साथ चलता है | 
अगला रस का अंग है संचारी भाव-
 संचारी भावों को ही व्यभिचारी भाव कहा जाता है | यह संचारी भाव अस्थिर चितवृत्ति है, जो संचारी भाव कहलाते हैं | ये मनोविकार आश्चर्य और आलंबन के मन में उठते रहते हैं , गिरते रहते हैं, समाप्त होते रहते हैं, बनते रहते हैं |  इसको हम इस तरह समझ सकते हैं- जल के बुलबुले के सामान जैसे पानी में बुलबुले उठते हैं और वह समाप्त हो जाते हैं उसी प्रकार यह मनोभाव हैं यह मन में उठते रहते हैं, बैठते रहते हैं या डूबते रहते हैं | यह संचारी भाव सागर की लहरों के समान होते हैं, जैसे सागर में लहरे आती हैं एक के बाद दूसरी दूसरे के बाद तीसरे ... तो यह लहरें समुद्र को प्रभावित नहीं करती हैं , वो तो स्थिर रहता  है लेकिन पानी के बहाव को एक दिशा देती हैं, संचारी भावों से कभी रस की निष्पत्ति नहीं होती है वह स्थाई भाव के सहयोगी बनकर आते हैं, उनको सहयोग प्रदान करते हैं , उन्हें रसा अवस्था तक ले जाते हैं पर स्वयं बीच में जल तरंग की तरह से जल की लहरों की तरह से आरोहित या तिरो भूत होते रहते हैं यह जो संचारी भाव हैं , वे स्थाई भाव के होने के बाद उत्पन्न होते हैं, संचारी भाव रस रूप में परिणत नहीं हो पाते यह केवल स्थाई भावों को रस में परिणत होने में सहायता करते हैं जो स्थाई भाव है वह सूत्र रूप में होते हैं,  विभावादी के संयोग से पूर्व भी स्थाई भाव की सत्ता विद्यमान रहती है जबकि संचारी भाव विभाव आदि के अभाव में निशेष हो जाते हैं अर्थात उनकी सत्ता, उनका अस्तित्व नहीं रहता| स्थाई भाव संचारी भाव की अपेक्षा अधिक प्रबल होते हैं, कोई विरुद्ध अविरुद्ध भाव, अनुकूल या प्रतिकूल भाव न तो स्थाई भावों को तिरोहित कर पाता है न ही उन्हें दबाता है, वह तो अपने भीतर ही समाहित कर लेते हैं, जबकि संचारी भाव स्थाई भाव को आत्मसात नहीं कर पाते , स्थाई भाव ही रस दशा को प्राप्त करते हैं, भाव रस दशा को प्राप्त नहीं करते, स्थाई भाव मनुष्य में सहज जात होते हैं अर्थात जन्म से ही मनुष्य के साथ आते हैं, जबकि संचारी भाव आगंतुक होते है , बाद में आए हुए हैं ,स्थाई भाव संचारी भावों को अपनी और आकर्षित करते हैं उन्हें अपने समान बना लेते हैं , आत्मीय बना लेते हैं, जिस प्रकार सागर नदियों के जल को आत्मसात कर लेता है , उसी तरह स्थाई भाव भी संचारी भावों को आत्मसात कर लेते हैं,  स्थाई भाव स्थिर होते हैं, नित्य होते हैं, जबकि संचारी भाव अस्थिर और क्षण भंगुर होते हैं,  
संचारी भाव की संख्या-
 जैसे स्थाई भावों की संख्या भरतमुनि ने 9 निश्चित की थी संचारी भावों की संख्या काव्यशास्त्र में 33 मानी गई है|  यद्यपि आज समीक्षा शास्त्र में मनोविकारओं की संख्या निश्चित नहीं की जा सकती आज यह माना जाता है कि मनोविकार अनेक होते हैं , इसलिए उनको संख्या बध  नहीं किया जा सकता, परंतु भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्यों ने इनकी संख्या 33 मानी है | इन संचारी भावों में सबसे पहले हैं-  निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, दैन्य, चिंता,मोह, निद्रा, स्मृति, धृति, ब्रीड़ा, जड़ता,आवेद, गर्व, चपलता, हर्ष, विषाद, औत्सुक्य, अपस्मार , स्वप्न, विबोध, अमर्ष, अवहित्था, उग्रता मति, व्याधि, उन्माद, त्रास , वितर्क, मरण  33 संचारी भाव है जो स्थाई भावों को जागृत होने में उनके सहयोगी बनते हैं |






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