धूमिल का साहित्यिक परिचय
सुदामा पांडे धूमिल हिंदी की समकालीन कविता के प्रसिद्ध कवि हैं| उनका मूल नाम सुदामा पांडे था लेकिन वे धूमिल नाम से कविताएं लिखते थे| धूमिल का जन्म 1936 में वाराणसी के एक छोटे से गांव में हुआ| सुदामा पांडे की प्रारंभिक शिक्षा गांव की प्राथमिक पाठशाला में हुई| उसके बाद 1953 ईस्वी में उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए वे बनारस चले गए लेकिन घर की आर्थिक हालत ठीक न होने के कारण वे अपनी आगे की पढ़ाई जारी न रख सके| उसके बाद आजीविका की तलाश में वे काशी और उसके बाद कलकत्ता भी गए| उनको नौकरी तो मिल गई लेकिन भारी मानसिक यंत्रणा झेलने के कारण वर्षों से रहने वाला सिरदर्द अंत में ब्रेन ट्यूमर बनकर सामने आया और केवल 39 वर्ष की कम आयु में ही उनकी मृत्यु हो गई| 10 फरवरी 1975 में धूमिल इस दुनिया से चले गए|
धूमिल ने पहली बार कविता तब लिखी थी जब वे सातवीं कक्षा में पढ़ते थे| उन्होंने कहानियां भी लिखी, सन 1984 में धूमिल की मौत के बाद उनकी 2 कहानियां 'फिर भी वह जिंदा है' और 'कुसुम दीदी' प्रकाशित हुई | उनका रचना काल लगभग एक दशक का रहा लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने कविता को बदल कर रख दिया|
धूमिल की प्रकाशित रचनाएं-
धूमिल को हिंदी कविता के साठोत्तरी कविता के महत्वपूर्ण कवियों में गिना जाता है| उनके तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हुए- संसद से सड़क तक (1972) में, कल सुनना मुझे (1976), सुदामा पांडे का प्रजातंत्र (1984) उनके काव्य संग्रह 'कल सुनना मुझे' के लिए उन्हें 1979 का मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया| उनकी प्रसिद्ध कविताओं में मोचीराम,रोटी और संसद,, नक्सलबाड़ी ,पटकथा, भाषा की रात , अकाल दर्शन ,राजकमल चौधरी . प्रजा तन्त्र के विरुद्ध आदि कविताएँ शामिल हैं | धूमिल ने अपनी कविताओं में तत्कालीन सत्ता धारियों से अनेक सवाल पूछे हैं , ऐसा लगता है जैसे ये उनकी कविता नहीं बल्कि एक ऐसा प्रश्नपत्र है जिसमें लिखे गए सारे प्रश्न अनिवार्य हैं| ये भी सच है कि उस समय की संसद उनके किसी सवाल का जवाब नहीं दे पाई| धूमिल भाषा ठीक करने से पहले आदमी को ठीक करना चाहते हैं, वे अपनी कविताओं में कुछ इस तरह सवाल करते हैं-
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क्या आजादी तीन थके हुए रंगों का नाम है ? जिन्हें एक पहिया ढोता है ? या इसका कोई खास मतलब होता है ?
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कि संत या सिपाही में / देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है ?
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........................कविता क्या है ? कोई पहनावा है? कुरता-पाजामा है ?
कहा जा सकता है किउनका रचना कर्म उस समय के आम आदमी के जीवन- संघर्ष का सच्चा दस्तावेज़ है| वे स्वयं भी लगातार जीवन संघर्षों से लड़ने वाले रचनाकार थे | उनको व्यवस्था से भी लड़ना पड़ा| उन्होंने एक समझौताहीन जीवन जिया और कविता के क्षेत्र में लीक से हटकर अपनी एक नई परंपरा विकसित की| धूमिल ने विशिष्ट अंतर्वस्तु और बनावट से रहित, मुहावरों तथा बिंबों और सरल गद्यात्मक भाषा पद्धति के माध्यम से अपने समय की युवा पीढ़ी की इच्छाओं और उनके लगातार टूटे सपनों को कविता का विषय बनाया | उनकी कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंग की पीड़ा और आक्रोश की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है| सत्ता व्यवस्था, जिसने जनता को धोखा दिया है, उसको आइना दिखाना धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य दिखाई देता है|
सुदामा पांडे धूमिल हिंदी की समकालीन कविता के प्रसिद्ध कवि हैं| उनका मूल नाम सुदामा पांडे था लेकिन वे धूमिल नाम से कविताएं लिखते थे| धूमिल का जन्म 1936 में वाराणसी के एक छोटे से गांव में हुआ| सुदामा पांडे की प्रारंभिक शिक्षा गांव की प्राथमिक पाठशाला में हुई| उसके बाद 1953 ईस्वी में उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए वे बनारस चले गए लेकिन घर की आर्थिक हालत ठीक न होने के कारण वे अपनी आगे की पढ़ाई जारी न रख सके| उसके बाद आजीविका की तलाश में वे काशी और उसके बाद कलकत्ता भी गए| उनको नौकरी तो मिल गई लेकिन भारी मानसिक यंत्रणा झेलने के कारण वर्षों से रहने वाला सिरदर्द अंत में ब्रेन ट्यूमर बनकर सामने आया और केवल 39 वर्ष की कम आयु में ही उनकी मृत्यु हो गई| 10 फरवरी 1975 में धूमिल इस दुनिया से चले गए|
धूमिल ने पहली बार कविता तब लिखी थी जब वे सातवीं कक्षा में पढ़ते थे| उन्होंने कहानियां भी लिखी, सन 1984 में धूमिल की मौत के बाद उनकी 2 कहानियां 'फिर भी वह जिंदा है' और 'कुसुम दीदी' प्रकाशित हुई | उनका रचना काल लगभग एक दशक का रहा लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने कविता को बदल कर रख दिया|
धूमिल की प्रकाशित रचनाएं-
धूमिल को हिंदी कविता के साठोत्तरी कविता के महत्वपूर्ण कवियों में गिना जाता है| उनके तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हुए- संसद से सड़क तक (1972) में, कल सुनना मुझे (1976), सुदामा पांडे का प्रजातंत्र (1984) उनके काव्य संग्रह 'कल सुनना मुझे' के लिए उन्हें 1979 का मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया| उनकी प्रसिद्ध कविताओं में मोचीराम,रोटी और संसद,, नक्सलबाड़ी ,पटकथा, भाषा की रात , अकाल दर्शन ,राजकमल चौधरी . प्रजा तन्त्र के विरुद्ध आदि कविताएँ शामिल हैं | धूमिल ने अपनी कविताओं में तत्कालीन सत्ता धारियों से अनेक सवाल पूछे हैं , ऐसा लगता है जैसे ये उनकी कविता नहीं बल्कि एक ऐसा प्रश्नपत्र है जिसमें लिखे गए सारे प्रश्न अनिवार्य हैं| ये भी सच है कि उस समय की संसद उनके किसी सवाल का जवाब नहीं दे पाई| धूमिल भाषा ठीक करने से पहले आदमी को ठीक करना चाहते हैं, वे अपनी कविताओं में कुछ इस तरह सवाल करते हैं-
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क्या आजादी तीन थके हुए रंगों का नाम है ? जिन्हें एक पहिया ढोता है ? या इसका कोई खास मतलब होता है ?
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कि संत या सिपाही में / देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है ?
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........................कविता क्या है ? कोई पहनावा है? कुरता-पाजामा है ?
कहा जा सकता है किउनका रचना कर्म उस समय के आम आदमी के जीवन- संघर्ष का सच्चा दस्तावेज़ है| वे स्वयं भी लगातार जीवन संघर्षों से लड़ने वाले रचनाकार थे | उनको व्यवस्था से भी लड़ना पड़ा| उन्होंने एक समझौताहीन जीवन जिया और कविता के क्षेत्र में लीक से हटकर अपनी एक नई परंपरा विकसित की| धूमिल ने विशिष्ट अंतर्वस्तु और बनावट से रहित, मुहावरों तथा बिंबों और सरल गद्यात्मक भाषा पद्धति के माध्यम से अपने समय की युवा पीढ़ी की इच्छाओं और उनके लगातार टूटे सपनों को कविता का विषय बनाया | उनकी कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंग की पीड़ा और आक्रोश की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है| सत्ता व्यवस्था, जिसने जनता को धोखा दिया है, उसको आइना दिखाना धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य दिखाई देता है|
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