काव्य दोष-2
देखा जाये तो अनेक काव्य दोष हैं जिनका विवेचन काव्य शास्त्रीय विद्वानों ने किया है| लेकिन अगर मूल रूप से देखें तो काव्य में शब्द दोष, अर्थ दोष और रस दोष को माना जाता है| काव्य शास्त्रीय विद्वानों ने इनको अलग-अलग श्रेणियों में रखा है| जैसे कुछ प्रमुख दोष होते हैं तो कुछ गौण होते हैं, कुछ अवांछित होते हैं , जो आ जाते हैं| कुछ काव्य की वस्तु को व्याकरणिक व्यवस्था के अनुरूप ढालने के कारण आ जाते हैं | अत: ऐसे अनेक कारण है जिससे कविता में काव्य दोष उत्पन्न होते हैं| काव्य शास्त्रीय विद्वानों के विवेचन को देखने के उपरांत (काव्य दोष-1) प्रमुख काव्य दोष निम्न हो सकते हैं -
1 श्रुति कटुत्व दोष -जो शब्द कानों को अच्छे या प्रिय न लगे या बहुत कठिन या कठोर लगे तो वहां श्रुति कटुत्व दोष होता है| जैसे जब हम कवि के मुख से , या कक्षा में शिक्षक के द्वारा हम कविता पाठ सुन रहे हैं तो जो सुनने वाला है, यदि उनको काव्य सुनने के दौरान कठोरता का अहसास हो, ऐसा कविता में प्राय: कटु शब्दों के प्रयोग से होता है| कविता का जो रस है उससे उसकी प्रतीति ही ना हो या उसका आस्वाद भंग हो जाए तो ऐसे दोष को श्रुति कटुत्व दोष माना गया है| संस्कृत में, हिंदी में या तमाम भारतीय भाषाओं में बहुत सारे कवियों की कविताओं में ऐसे उदाहरण हम देख सकते हैं | जैसे-
"भर्त्सना से भीत ही वह बाल तब चुप हो गया|"
यहाँ भर्त्सना शब्द कटु है | भर्त्सना शब्द की संरचना, उसके उच्चारण में, उसको सुनने में हमें कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है, कानों को कटुता का बोध होता है| दूसरी तरह वीर रस में रचित प्रसाद की कविता देखी जा सकती है जिसमें तनिक भी कटुता का आभास नहीं होता -
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती .........|
2 च्युत संस्कृति दोष..
च्युत का अर्थ होता फिसलना | जहाँ कवि नवीनता लाने या छंद बाद्यता के कारण कोई नया प्रयोग करता है, अथवा नया शब्द गढ़ता है तो शब्द को लेकर काव्य में व्याकरण दोष आ जाता है| यानी वह प्रयोग भाषा की संस्कृति के अनुकूल न हो तब वह च्युत संस्कृति दोष कहलाता है | क्योंकि कहा भी गया है कि जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि| जैसे - इस निराशता को छोड़ो, आशा से लो काम | कवि व्याकरण से चालित नहीं होता इसलिए कविता में इस तरह का दोष देखा जा सकता है |
3 अश्लीलत्व दोष
अश्लीलता का प्रयोग भी काव्य में देखा जाता है| जहाँ मर्यादा की सीमा लांघ दी जाती है वहां काव्य में अश्लीलता आ जाती है संयोग श्रृंगार वर्णन में भी कभी कभी यह दोष देखा जा सकता है| जहाँ पर देश या समज की संस्कृति के विरूद्ध कहना पड़े, या समाज जिसकी अनुमति न दे और यदि किसी कारण से कवि उसका वर्णन अपनी कविता में कर दे तो वह अश्लीलता दोष कहा जाता है| मध्यकालीन कविता में ऐसा वर्णन है लेकिन वहां मर्यादित है , आधुनिकता कालीन कविता में इस तरह का प्रयोग मिलता है| आलोचक इसका एक कारण पाश्चात्य कविता के प्रभाव को भी मानते हैं | जैसे - वायु रोग या निवस्त्र का प्रयोग कविता में कर देना, लेकिन श्रृंगार का अतिरेक दोष नहीं माना जाता है| यहाँ एक बात और महत्त रखती है कि कविता अश्लील है या नही है ये पाठक पर निर्भर है उसकी वृत्ति पर निर्भर करता है| जैसे - मिची आँख पिय की निरखि वायु दीन तत्काल | अब इसमें वायु अर्थात वात के रूप में है कि थोड़ा सा अवसर पाते ही प्रियतम से आंख बचाकर नायिका के द्वारा वायु का निस्तारण किया गया है|
4 ग्राम्यत्व दोष -
साहित्यिक रचना में सामान्य बोलचाल के ग्रामीण संस्कृति के शब्दों का प्रयोग जब बाहुल्य में होने लगता है तो यह दोष कविता में आ जाता है| कविता में तो शब्दावली भी उसी प्रकार की होनी चाहिए जैसे पात्र हो | ग्रामीण है और उसके संवादों में ग्रामीणता हो और अगर अभिजात्य वर्ग है तो उसके लिए ग्रामीण बोलचाल के शब्दों का प्रयोग होना ठीक नहीं लगता| जैसा देश भाषा भी वैसी ही प्रयोग होनी चाहिए जैसे -
"मूंड पै मुकुट धरे सोहत गोपाल हैं |"
यहां सिर के लिए मूंड शब्द का प्रयोग हुआ है जो कि कृष्ण जैसे अवतार पुरुष के लिए हुआ है अत: विषय के महत्व को देखते हुए गलत है| यहाँ पर शीश आता तो ज्यादा अच्छा होता | कहते हैं- निकी प फीकी लगे बिन अवसर की बात|
5 अप्रतीतत्व दोष
वह शब्द जिसके अर्थ की विधिवत प्रतीति न हो| लोक व्यवहार में प्रयुक्त न में होने वाले शास्त्रीय शब्दों का काव्य में प्रयोग होना| जैसे -
"विषमय यह गोदावरी अमृतन को फल देत"
'विष' शब्द का प्रयोग जल के लिए हुआ है जो सामान्यतः लोक व्यवहार में जल के लिए प्रयुक्त नहीं होता, जहर के लिए होता है | अत यह अप्रतीतत्व दोष है|
6 क्लिष्टत्व दोष
काव्य का अर्थ पाठकों के लिए सहज होना चाहिए| अर्थ को समझने के लिए कोश या कोई अन्य सहायक उपकरण ढूढने की आवश्यकता न पड़े |
7 न्यूनपदत्व दोष
जहां काव्य में कवि के अभीष्ट अर्थ को सूचित करने वाले पद की कमी हो जाये और अर्थ को स्पष्ट करने के लिए स्वयं ही कोई दूसरा शब्द जोड़ना पड़े, अर्थ अपने आप ही समझ ना पड़े तो वहां न्यून पदत्व दोष होता है | जैसे - यहांअंगद का उदाहरण देखा जा सकता है-
पानी, पावक, पवन, प्रभु ज्यौं असाधु त्यौं साधु
यहां अंगद रावण को कहना चाहता है कि हमारे प्रभु राम साधु और असाधु या मित्र अथवा शत्रु या सज्जन -दुर्जन के साथ समान व्यवहार करते हैं, यहां पर कवि यह कहना चाहता था, किंतु इस पंक्ति में समान व्यवहार के लिए कोई भी शब्द नहीं आया है अतः समान व्यवहार वाले शब्द को यहां छोड़ दिया गया है और पाठक को खुद ही अर्थ को समझना पड़ रहा है तो इससे अर्थ में बाधा उत्पन्न हो रही है इसलिए यहां पर न्यून पदत्व दोष है|
8 अधिक पदत्व दोष
काव्य में अनावश्यक शब्दों का आना अधिक पदत्व दोष कहलाता है| जिससे काव्य का सौन्दर्य कम होता है|
9 अक्रमत्व दोष
जहा शब्द का क्रम अनुचित हो अर्थात शब्द का क्रम से प्रयोग न हो| जब कोई पद अपने उचित स्थान पर प्रयोग न होकर अनुचित स्थान पर प्रयोग किया जाए अथवा उसका अर्थ के अनुसार क्रम जोड़ने में कठिनाई हो तो वहां अक्रमत्व दोष होता है| जैसे-
विश्व में लीला निरंतर कर रहे हैं मानवी
यहां मानवी शब्द लीला से पहले प्रयोग होना चाहिए था कि वे प्रभु इस संसार में निरंतर मानवी लीला कर रहे हैं | किसी भाषा की संरचना के दबाव से भी काव्य में यह दोष बन जाता है |
10 दुष्क्रमत्व दोष
जहाँ शास्त्र या लोक के विरुद्ध काम को दिखाया गया हो जैसे -
"नृप हय दीजिए अथवा मत गजेंद्र|"
यहां पहले हाथी मांगना चाहिए था और हाथी न मिलने पर घोड़े को माँगना चाहिए था किंतु यहां पहले हय अर्थात घोड़े को मांगा गया है | अतः यहां पर दुष्क्रमत्व दोष है | लोक विरुद्ध क्रम है
11.पुनरुक्ति दोष
जब किसी एक शब्द से अर्थ प्रकट हो जाने पर भी उसी अर्थ वाले शब्द का दोबारा प्रयोग किया गया हो तब वह पुनरुक्ति दोष होता है| जैसे -
"सब कोऊ जानत तुम्हें सारे जगत जहान" यहां जगत के बाद जहान का प्रयोग अनावश्यक रूप से हुआ है अतः पुनरुक्ति दोष आ गया है |
12 रस दोष
रस दोष पर पहले भी हम बात कर चुके हैं| इसके बारे में एक बात और कही जा सकता है कि जहां भाव व्यंग्य रूप में न होकर स्वयं ही अपना वर्णन करने लगे, वहां स्वशब्द रस दोष होता है जैसे
विस्मृति आ अवसाद घेर ले, नीरवते बस चुप कर दे|
यहां नीरवता की स्थिति में चुप कर दे कहने मात्र से स्वशब्द रस दोष आ गया है|
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें