काव्य दोष-1
आज का हमारा विषय काव्य दोष है| इस विषय के अंतर्गत हम संस्कृत काव्यशास्त्र या हिंदी काव्यशास्त्र में काव्य दोषों को लेकर जो जो लिखा गया हैं या जो कुछ कहा गया है, उन सब के विषय में विचार करेंगे।जिस तरह से आपने पढ़ा है कि कविता के तीन मुख्य गुण माने जाते हैं- प्रसाद गुण, माधुर्य गुण और ओज गुण तथा कुछ दूसरे भी और भी गुण है जो कविता में उपस्थित होकर काव्य के सौंदर्य को बढ़ाते हैं | उन गुणों की विशेषताओं एवं महत्व को तो हम जानते हैं। लेकिन काव्य में दोष भी होते हैं जो काव्य के महत्व को घटाते हैं इसलिए हमे उन दोषों के बारे में भी जान लेना बहुत ही जरूरी है। हमारे प्राचीन संस्कृत काव्यशास्त्र में आचार्य वामन हुए हैं जिन्होंने रीति संप्रदाय की स्थापना की थी तो रीति संप्रदाय के संस्थापक वामन ने रीति संप्रदाय की बात करते हुए काव्य के गुण और दोषों पर भी विस्तृत चर्चा की है| हालांकि रीति संप्रदाय पर विचार करते हुए ही उन्होंने काव्य गुण और काव्य दोष पर विचार किया है। काव्य गुण और काव्य दोष पर विचार करने वाले आचार्यों में केवल वामन ही नहीं हैं | उनसे पहले भी आचार्य भरतमुनि से लेकर और उनसे आगे आने वाले आचार्यों ने भी इन दोनों विषयों का विवेचन किया है। यही कारण है कि आंरभ में काव्य गुण और दोषों की संख्या जो कम थी वह धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते 10 शब्द और 10 अर्थ गुणों तक पहुंच गई। ऐसे ही कव्य दोषों की संख्या भी बढ़ती चली गई। ये संख्या 21 तक पहुच गई। इस प्रकार काव्य दोष अनेक प्रकार के हो सकते हैं और इन दोषों की विवेचना हमारे संस्कृत काव्य शास्त्रों में विस्तार से हुई भी है|
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि आचार्य वामन ने रीति संप्रदाय पर बात करते हुए काव्य के गुण और दोषों का भी विस्तृत विवेचन किया है | अत : सबसे पहले हम रीति संप्रदाय के संस्थापक आचार्य वामन के विवेचन को ही देख लेते हैं उन्होंने काव्य के कौन-कौन से दोष बताये हैं -
1 आचार्य वामन
आचार्य वामन ने काव्य गुण और दोषों को विस्तार से बताते हुए लिखा है-
"गुण विपर्ययात्मनों दोष:।" विपर्यय का अर्थ होता है विपरीत, गुणों के विपरीत दोष है | कहने का तात्पर्य है कि अगर काव्य में गुण नहीं हैं तो दोष हैं | अर्थात गुणों का अभाव ही काव्य दोष है। वामन ने कहा है कि कविता में जिन गुणों (जैसेकि माधुर्य गुण, ओजपूर्ण, प्रसाद गुण आदि) को हम मानते हैं अगर ये गुण कविता में विलुप्त हो जाए तो इसका अर्थ है कि कविता में दोष आ गए। अर्थात गुणों के अभाव की स्थिति या गुणों की अनुपस्थिति को काव्य दोष माना जाएगा। यह अभाव की स्थिति ही काव्य दोष के आने का कारण बनती है।
वामन गुणों के चार भेद करते हैं -
1 पद दोष (5)
2 पदार्थ दोष (5)
3 वाक्य दोष (3)
4 वाक्यार्थ रूप दोष (7)
इस प्रकार वामन ने बताया है कि अगर काव्य में गुणों की अनुपस्थिति है तो फिर काव्य में ये चार प्रकार के दोष उत्पन्न होंगे जो मैंने ऊपर बताये हैं अर्थात - पद दोष, पदार्थ दोष, वाक्य दोष, वाक्यार्थ रूप दोष। अतः: वामन ने इन चार मुख्य दोषों के आने का कारण गुणों के अभाव को माना है।
1.पद दोष
अब इन चार में जो पहला दोष है अर्थात पद दोष, सबसे पहले उसके बारे में जानते हैं | देखिये आपको बता दूँ कि पद क्या होता है? दो या दो से अधिक वर्णों के सार्थक मेल को शब्द कहते हैं और यही सार्थक शब्द जब वाक्य मे प्रयुक्त होते हैं तो 'पद' कहलाते हैं, इस प्रकार पद वाक्य की इकाई होती है अत: वामन ने वाक्य में पांच पद दोष बताए हैं -
• असाधु
• कष्ट
• ग्राम्य
• अप्रतीत
• अनर्थक
*असाधु से अभिप्राय होता है व्याकरणिक अशुद्धि अर्थात अगर कविता में व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध शब्द, पद या वाक्य आ जाए या लिंग, वचन या कोई और अशुद्ध पद के कारण वाक्य अशुद्ध हो जाए तो कविता में यह दोष माना जायेगा | इसे ही असाधु दोष कहा जाता है। बहुत बड़े-बड़े कवियों ने इस प्रकार की अशुद्धियां की हैं। इस प्रकार की व्याकरणिक अशुद्धि के आने के कई कारण होते हैं| कभी तो यह अशुद्धि अपने आप हो जाती है तो कभी कवि के खुद के प्रयास से हो जाती है| कभी- कभी यह व्याकरणिक अशुद्धि छंद की बाध्यता के कारण या मात्रा की बाध्यता के कारण भी हो जाती है। छंद पढ़ते समय आपने इस तरह की अशुद्धियों को देखा भी है। कहा भी गया है कि कवि और कविता व्याकरण के अनुसार नहीं चलता बल्कि व्याकरण कवि या कविता के अनुसार चलता है। व्ययाकरण की बाध्यता गद्य में होती है कविता में नहीं | उदाहरण के लिए जय शंकर प्रसाद की पंक्ति को देखा जा सकता हैं उन्होंने कामायनी में श्रद्धा के लिए लिखा है-
"कौन हो तुम वसंत के दूत"
यहां व्याकरणिक दृष्टि से श्रद्धा के लिए 'दूत' शब्द का प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता। क्योंकि दूत पुलिंग है श्रद्धा स्त्रीलिंग है। अतः व्याकरण की दृष्टि से यह दोष है। लेकिन महाकवि होने के नाते उस दोष को हम रेखांकित नहीं करते। इस प्रकार का प्रयोग असाधु दोष कहा जाता है।
• कष्ट
अगर कविता में कर्णकटु शब्दों का प्रयोग होता है तो भी कविता में दोष उत्पन्न होता है अर्थात जब हम कविता सुन रहे हैं या सुनते हुए ऐसा लगे जैसे कानो को कष्ट हो रहा है, कुछ ठीक सा प्रतीत नहीं होता या रुचिकर नहीं लग रहा है। तो इस तरह की शब्दावली का प्रयोग, या इस तरह के वाक्य विन्यास का प्रयोग, जब कानों के लिए कष्टकारी लगता है तो वह भी काव्य दोष माना जाता है। उसे भी पद दोष माना जाता है
• ग्राम्य
जब ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग अनावश्यक रूप से हो जाए और उससे कविता की बोधगम्यता अवरुद्ध हो तो यह दोष उत्पन्न होता है | अर्थात जहां ग्रामीण पात्र नहीं हैं और वहां पर ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग कर दिया जाए तो वह भी पद दोष माना जाता है।
• अप्रतीत दोष
अप्रतीत अर्थात प्रतीति न होना। (अप्रस्तुत के लिए) इसमें इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिसकी प्रतीति पाठक को ना हो। जिन शब्दों को पढ़कर या सुनकर पाठक को लगे कि उसने यह शब्द नहीं सुना है और इस शब्द का अर्थ क्या है? ऐसे शब्द, जिनको भाषा में अप्रचलित माना जाता है, उनका प्रयोग करना, दोष को जन्म देना माना जायेगा| क्योंकि इस प्रकार के शब्द कविता की अर्थ सम्प्रेषणीयता में बाधा बनते हैं | तब यह अप्रतीत दोष माना जाता है।
• अनर्थक
अनर्थक का मतलब होता है निर्रथक। वामन ने पद दोष के अंतर्गत यह पांचवा दोष माना है। अगर काव्य में कोई ऐसा शब्द है जिसका कोई अर्थ न हो अर्थात जो निरर्थक हो तो इस प्रकार के प्रयोग को पद दोष के अंतर्गत माना गया है। काव्य में इस प्रकार के उदाहरण भी बहुत बार मिलते हैं। कवि कभी कभी इस तरह के प्रयोग करते हैं जबकि हम देखते हैं कि अमुक कविता में अगर वो शब्द ना हो तो भी कवि का काम चल सकता था लेकिन किसी कारण वश, चाहे फिर वो छंद की बाध्यता के कारण ही क्यायों न हो, या किसी अन्य कारण से कवि इस तरह का प्रयोग कर देता है ।
2 पदार्थ दोष
वामन ने पद दोषो की ही तरह पदार्थ दोष भी पांच माने हैं-
• अन्यार्थ
• नेयार्थ
• गूढ़ार्थ
• अश्लील
• कलिष्ट
*अन्यार्थ का अर्थ होता है- जहां शब्द का भिन्न अर्थ में प्रयोग हो। यह वह दोष है जहां पर शब्द का प्रयोग अवांछित ( जिसकी इच्छा न की गई हो) अर्थ के रूप में हुआ हो या वह भिन्न अर्थ के रूप में प्रयोग हुआ हो। ऐसा कभी कवि जानबूझकर करता है तो कभी कभी कवि से ऐसा हो जाता है, या प्रस्तुत शब्द अप्रस्तुत अर्थ के लिए संकेत कर रहा हो। जैसे- रहिमन पानी राखिए .....|
* नेयार्थ
इसका अर्थ होता है- कल्पना से भिन्न, या कल्पना से परे या कल्पनातीत। ऐसा शब्द पदार्थ दोष के रूप में माना जाता है इसलिए उसे नेयार्थ कहा जाता है।• गूढ़ार्थ
अर्थात गूढ़ अर्थ को व्यक्त करने वाला या अप्रसिद्ध अर्थ देने वाला प्रयोग भी दोष माना गया है। प्रसिद्ध अर्थ वाला प्रयोग हो तो उसमें कठिनाई नहीं आती लेकिन अप्रसिद्ध अर्थ वाला प्रयोग कविता के अर्थ को समझने में कठिनाई पैदा करता है।
• अश्लीलता
जब कवियों के द्वारा कविता में अश्लीलता को पैदा करने वाले शब्दों, पदबंध या वाक्य विन्यास आदि का प्रयोग किया जाए तो यह दोष कविता में आ जाता है।
• क्लिष्ट
जहाँ कविता का अर्थ क्लिष्ट हो, अर्थात कठिन या दुरूह हो। कविता बोधगम्य ना हो। वहां पर क्लिष्ट दोष माना जाता है।
3 वाक्य दोष
वामन ने वाक्य दोषों का भी उल्लेख किया है। इनकी संख्या तीन मानी गई है।
• भिन्न वृत्ति वाक्य दोष
• यति भ्रष्ट वाक्य दोष
• विसंधि वाक्य दोष
व्याकरण की दृष्टि से यदि वृत्ति भिन्न हो जाए, यदि यति भिन्न हो जाए, यदि विसंधि भिन्न हो जाए तो ऐसी स्थिति पैदा होने पर वहां वामन ने वाक्य दोषों की परिकल्पना करते हैं । इसी प्रकार उन्होंने वाक्यार्थ दोषो का उल्लेख भी किया है और 7 वाक्यार्थ दोषों का वर्णन किया है| इस प्रकार सारे मिलाकर वामन ने कुल 20 दोषों का उल्लेख किया है।
4 वाक्यार्थ रूप दोष
• व्यर्थ।
• एकार्थ
• संदिग्ध
• उपयुक्त
• अपक्रम जहाँ अर्थ में क्रम न हो
• अलोक जिसका अर्थ देश काल और प्रवृत्ति विरुद्ध हो
• विद्या विरुद्ध जिसका अर्थ कला और शास्त्र के सिद्धांतों के विरूद्ध हो
* व्यर्थ
व्यर्थ माने पूर्वापर संबंध| प्रबंध काव्य की कथा में तो पूर्वापर संबंध होता है लेकिन मुक्तक काव्य में नही होता| अगर कविता में पूर्वापर विरोधी कोई प्रयोग हो तो वह दोष माना जाएगा| अगर काव्य में कोई कथन पहले प्रस्तुत किया गया हो उससे अगले कथन में जो बात कही जा रही है वह पूर्व कथन की विरोधी बात हो तो वह व्यर्थ दोष कहा जाता है।
* एकार्थ
यानी एक ही अर्थ की आवृत्ति, एक ही अर्थ की आवृत्ति यदि फिर से हो ,उसे एकार्थ दोष कहा जाता है।
* संदिग्ध दोष
जहां पर बहुत निश्चित स्थिति ना हो, कोई न कोई संशय बना रहे, यानी ये है, कि नहीं है, है कि, नहीं है आदि का प्रयोग कविता में हुआ है तो यह भी एक दोष है, उसका उल्लेख भी वामन ने किया है
* अप्रयुक्त दोष
जो प्रयुक्त न हो| जो प्रयुक्त न होने वाली शब्दावली है ,या प्रयोग है तो उससे भी दोष पैदा होता है
*अपक्रम
जहां पर क्रमिक अर्थ की प्रस्तुति ना हो, अर्थ भी क्रम में आना चाहिए। एक के बाद एक अर्थ आना चाहिए। पहले आने वाला अर्थ बाद में आए, यह नहीं होना चाहिए। बात पहले और अर्थ बाद में आ रहा है तो यह भी अपक्रम दोष है।
*अलोक
जो लोक की वस्तु न हो या जो लोक से परे हो इसका अर्थ है जो बात देश काल और प्रवृत्ति के विपरीत हो, विरुद्ध हो अर्थात जैसा इस संसार में न होता हो वैसा कुछ प्रयोग कर देना तो उसको अलोक दोष कहा जायेगा|
*विद्या विरुद्ध दोष
विद्या विरुद्ध दोष का उल्लेख भी वामन करते हैं| इसका अर्थ होता है कि जो कला और शास्त्र, दोनों के सिद्धांतों के विरुद्ध हो| अर्थात जो हमारी कला और शास्त्र-विद्या है, यदि कविता में उस शास्त्र या विद्या के विरुद्ध कोई प्रयोग दिखाई पड़ता है तो उसे विद्या विरुद्ध दोष कहा जाता है।
इस तरह वामन ने रीति संप्रदाय के संबंध में जिन काव्य गुण और दोषों का विस्तृत विवेचन किया है उसी को हम काव्यदोष के रूप में देखते हैं। माना जा सकता है कि उन्होंने काव्य दोषों का बहुत सरल, स्पष्ट वर्गीकरण किया है|
वामन से पहले भी काव्य दोष पर काव्य शास्त्रों में उल्लेख मिलता है| आदि आचार्य भरतमुनि ने भी अपने नाट्यशास्त्र में काव्य दोषों का उल्लेख किया है और आचार्य वामन के विवेचन में हमें कहीं न कहीं आचार्य भरतमुनि का प्रभाव दिखाई देता है| जैसे भरतमुनि ने भी गुण विपर्यय की बात कही है जिसको आगे चलकर वामन कहते हैं|
1 आचार्य भरतमुनि
आचार्य भरतमुनि ने काव्य दोषों को काव्य गुणों से जोड़ते हुए बात की है। ऐसा करते समय उन्होंने काव्य में गुणों की भूमिका पर भी बात की है और उन्होंने गुण विपर्यय को काव्य दोष माना है| अर्थात गुण के विपरीत वाली वस्तु या कह सकते हैं कि जो गुण के विपरीत है वही दोष है| अथवा गुणो के अभाव से ही काव्य में दोष आ जाते हैं। इस प्रकार आचार्य भरतमुनि ने काव्य के दस दोष गिनाए हैं -
1 गूढ़ार्थ- अर्थात क्लिष्ट अर्थ का प्रयोग होना ।
2 अर्थान्तर -जहां पर अर्थ का अंतरण हो जाता है, जहां कुछ अन्य अर्थ प्रकट होने लगता है।
3 अर्थहीन -अर्थ हीनता को भी एक दोष के रूप में भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में गिनाया है, अर्थात अर्थ ही पता न चले। जहाँ असंगत कथन कहा गया हो |
4 भिन्नार्थ -अर्थात भिन्न अर्थ का द्योतक शब्द का प्रयोग अगर होगा वह भी काव्य दोष की श्रेणी में आएगा
5 एकार्थ- एक अर्थ के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग, या अनेक शब्द जब एक ही अर्थ को देने वाले हो, इस तरह का प्रयोग दोष माना जायेगा |
6 अभिप्लुतार्थ- बहुत से अर्थों में जहाँ आंतरिक लय खंडित हो जाये| या विभिन्न अर्थों में अन्विति का अभाव हो जाए| उनका आपस में जुडाव ही न हो | अर्थात जहाँ चरण पूरा होने पर भी अर्थों का कोई मेल न हो |
7 न्यायादपेत- जो तर्क रहित हो, अर्थात जिसमें कोई तार्किक आधार न दिखाई दे वह न्यायादपेत दोष होगा जहाँ तथ्य प्रमाण रहित हो|
8 विषय- छंदोंभंग की स्थिति को विषय दोष माना जायेगा, जब छंद में वर्ण या मात्रा आदि का विधिवत प्रयोग ना हो और वह कविता में छंद भंग की स्थिति को पैदा करें तो उसको विषय दोष कहा गया है|
9 विसंधि- वि अर्थात विच्छेद संधि माने संधि, अर्थात जब काव्य में इन दोनों का अभाव हो, विच्छेद और संधि दोनों को ही व्याकरण में महत्त्वपूर्ण माना गया है|
10 शब्दहीन- 'हीन' शब्द का काव्य में प्रयोग न करना , कहने का तात्पर्य यह है काव्य में हीन शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए| यहां पर शब्दहीन का मतलब शब्द के बिना नहीं है, बल्कि हीन शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए ये माना गया है|
अत: आचार्य भरतमुनि ने गुण विपर्यय को दोष मानते हुए मुख्य रूप से दस दोषों का उल्लेख किया है| इस प्रकार कहा जा सकता है कि गुणों से कविता बोधगम्य बनती है, अधिक सुंदर बनती है, संप्रेषणीय बनती है| इसके विपरीत कविता में यदि दोष आ जाए तो कविता सभी गुणों से विहीन हो जाती है| इसलिए गुणों से काव्य का साहित्य में महत्त्व बढ़ जाता है और दोष आने से वह सम्प्रेषणीय तथा अग्राह्य हो जाती है।
2 आचार्य मम्मट
आचार्य मम्मट ने काव्य दोषों पर विचार करते हुए कहा है-
"मुख्यार्थहतिदोष: रसश्च मुख्य:।"
शास्त्रों में रस को काव्य की आत्मा माना गया है| रस से काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है| अर्थात जब काव्य के मुख्य अर्थ यानी वाच्यार्थ की हानि हो या कह सकते हैं कि जहाँ वाच्यार्थ में रस की हानि हो तो वह काव्य दोष माना जाएगा। कवि अपने काव्य के माध्यम से जो कहना चाहता है या उसका जो अभीष्ट अर्थ है और अगर उस अभिष्ट अर्थ की हानि होती है तो वह रस दोष माना जाएगा| फिर चाहे यह हानि किसी भी कारण से हो| कहने का मतलब यह है कि जो कवि का अभीष्ट है अगर वह किसी कारण से अवरुद्ध हो जाता है, खंडित हो जाता है या संचरित नहीं हो पाता तो इससे कविता में दोष आ जाता है। मम्मट की दृष्टि में यह मुख्य अर्थ के संप्रेषण की हानि ही रस की हानि है। इसको रस का अपकर्ष भी कहा गया है। रस संबंधी काव्य दोष को तीन प्रकार से माना गया है-1 रस की प्रतीति या आस्वाद ही न हो
2 प्रतीति या आस्वाद तो हो किन्तु किसी कारण से देर से प्रतीती या आस्वाद हो यानि रस के आस्वादन में विलंभ हो।
3 प्रतीति होते हुए भी रस का अपकर्ष हो
इस प्रकार ये तीन प्रकार के काव्यदोष काव्य में रस का संचार करने में बाधक बनते हैं | जब हम इन तीनों दोषों पर बात करते हैं तो पहला रस दोष है- रस की प्रतीति ही न हो। दूसरा है- प्रतीति हो, किंतु विलंब से हो। तीसरा है- प्रतीति होते हुए भी रस का अपकर्ष हो। जहां रस की प्रतीति ही न हो अर्थात जहां रस का बोध ही ना हो, ज्ञान ही ना हो, यही ना पता चले कि रस है या नहीं है। इस तरह से देखा जाये तो रस के 9 प्रकार हैं जैसे - करुण रस, वीर रस, श्रंगार रस, हास्य रस, आदि| अगर कविता पढ़ते समय रस का बोध ही ना हो, रस में बाधा उत्पन्न हो तो वह काव्य दोष है। क्योंकि कवि कविता लिखने से पहले किसी न किसी रस की परिकल्पना अवश्य करता है और कविता लिखने के बाद अगर वह रस प्रकट ही न हो या उसके प्रकट होने में अवरोध उत्पन्न होता है तो यह भी काव्य दोष है।
रस संबंधी दूसरा दोष है- जिसमें रस की प्रतीति तो हो किंतु विलंब से हो| अर्थात रस का बहुत देर में बोध हो, तो यह भी दोष माना जाएगा| क्योंकि कविता सुनते ही आस्वाद की स्थिति और रस का स्थाई भाव भी ज्ञान हो जाना चाहिए | इसका तात्पर्य यह है कि जैसे ही आप या पाठक कविता पढ़ें या सुने तो उसे तुरंत पता चल जाए कि यह किस रस की कविता है। जैसे ..."खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी" इस कविता को पढ़ते ही पता चल जाता है कि वीर रस की कविता है।
तीसरा दोष है कि प्रतीति होते हुए भी रस का अपकर्ष हो। अपकर्ष का अर्थ होता है- अवनति, उतार या ह्रास| अर्थात हमें यह तो पता चल रहा है की यह कविता श्रृंगार रस या वीर रस की है लेकिन प्रतीति होने पर रस अपकर्ष यदि होता है तो यह काव्य दोष है| कविता पढ़ते समय अगर हमें यह लग रहा है कि ये वीर रस की कविता है लेकिन उसमें रस का अपकर्ष हो रहा है तो यह भी काव्य दोष माना जाता है | अर्थात फिर भी वो उस रस की नही लगती।
इस तरह से हम देख सकते हैं कि मम्मट ने रस संचार में यानी रसास्वादन में तीन प्रकार की बाधाएं काव्य दोष के अंतर्गत आती है।
4 आचार्य दंडी-
आचार्य दंडी ने दोष विवेचन को आगे बढ़ाते हुए कहा है-
मुख्यार्थ: विघातका दोष:
अर्थात मुख्यार्थ में बाधा बनने वाली सामग्री का नाम दोष माना है| आचार्य दंडी ने कहा है कि यदि कविता में कवि के मुख्य अर्थ को विघटित करने वाली सामग्री का प्रयोग दिखाई दे तो इस मुख्य अर्थ के संप्रेषण में बाधा बनने वाली सामग्री को काव्य दोष कहते हैं| अत: दंडी ने मुख्यालय में बाधा उत्पन्न करने वाली सामग्री को ही काव्य दोष माना है| इसके अतिरिक्त आचार्य दंडी ने दोषों की संख्या दस मानी है |
5 आचार्य व्यास -
आचार्य व्यास ने दोष के बारे में लिखा है -
"उद्वेग जनको दोष:"
अर्थात आचार्य व्यास ने काव्यास्वाद में बाधक उद्वेग जनक तत्व को काव्य दोष कहा है|
6 आचार्य भामह जहाँ आचार्य दंडी ने दोषों की संख्या दस, आचार्य भरतमुनि ने भी काव्य के दस दोष गिनाए हैं, आचार्य वामन में बीस बताई है वहीँ आचार्य भामह ने इन सबसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए दोषों की संख्या इक्कीस बताई है|
7 आचार्य विश्वनाथ
"रसापकर्षका दोष: |"
अर्थात रस का अपकर्ष करने वाले कारक दोष कहे जाते हैं कहां है यानी रस के अपकर्ष यानि हानि या रस की अनुभूति, या रसास्वाद के मार्ग में जो भी बाधा बनते हैं, वही रस दोस्त कहलाते हैं |
8 आचार्य आनंद वर्धन
आचार्य आनंदवर्धन ने दोष के स्थान पर अनौचित्य शब्द का प्रयोग किया है| औचित्य सिद्धांत की स्थापना क्षेमेन्द्र ने की थी | औचित्य का अर्थ होता है जो काव्य में उचित हो और अनौचित्य का अर्थ है जो उचित न हो अर्थात अनुचित जो कविता में दोष होता है वह ही अनुचित होता है| उन्होंने काव्य दोष के दो भेद किए हैं - नित्य दोष और अनित्य दोष |
नित्य दोष- वे दोष है जो सदा बने रहते हैं, हमेशा बने रहते हैं, ये कभी कभी नहीं आते बल्कि काव्य में किसी न किसी रूप में नियमित रूप से उनकी स्थिति बनी रहती है|
अनित्य दोष- वे दोष माने जाते हैं जो हमेशा नहीं रहते हैं| ये कभी कभी परिस्थिति के दबाव में, या किसी और कारण से कविता में आ जाते हैं, और जब स्थिति बदलती है तो इन दोषों का निराकरण हो जाता है अर्थात वे दोष दोष नहीं रहते इस तरह के अनित्य दोष होते हैं जैसे कोई कोई शब्द कटु आ गया लेकिन स्थिति बदलने पर उनका निवारण कर दिया जाता है |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें